गाजियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की मंजूरी
शीर्ष अदालत ने माना कि जब किसी मरीज के स्वस्थ होने की कोई वास्तविक संभावना न हो और वह लंबे समय से असहनीय चिकित्सकीय स्थिति में हो, तब उसे गरिमा के साथ विदाई देने पर विचार किया जा सकता है।

UP News : उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। करीब 13 साल से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। शीर्ष अदालत ने माना कि जब किसी मरीज के स्वस्थ होने की कोई वास्तविक संभावना न हो और वह लंबे समय से असहनीय चिकित्सकीय स्थिति में हो, तब उसे गरिमा के साथ विदाई देने पर विचार किया जा सकता है।
एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में होगी पूरी प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराया जाएगा। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चिकित्सा सहायता को चरणबद्ध तरीके से वापस लिया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी संवेदनशीलता, गरिमा और मानवीय सम्मान के साथ संपन्न की जानी चाहिए। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिजनों की स्थिति पर भी गंभीरता से विचार किया। उत्तर प्रदेश के इस परिवार ने वर्षों तक बेटे की सेवा की, लेकिन लगातार बिगड़ती हालत और शून्य सुधार की संभावना ने उन्हें मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया। हरीश के माता-पिता ने अदालत से अनुरोध किया था कि उनके बेटे को ऐसी अवस्था में अनंत पीड़ा में न रखा जाए और उसे इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए।
मेडिकल रिपोर्ट ने भी नहीं छोड़ी उम्मीद
एम्स की ओर से पेश मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक उनकी स्थिति लाइलाज है और लंबे समय से चेतना वापस आने के कोई संकेत नहीं मिले हैं। इसी तथ्य को आधार बनाते हुए अदालत ने मामले को केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी परखा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला ने टिप्पणी की कि यह अत्यंत दुखद और पीड़ादायक परिस्थिति है। अदालत के लिए ऐसा निर्णय लेना कभी आसान नहीं होता, लेकिन किसी व्यक्ति को वर्षों तक ऐसी अवस्था में बनाए रखना भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता, जब उसके ठीक होने की कोई संभावना न बची हो। अदालत ने यह भी माना कि जीवन की गरिमा केवल जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु के क्षण में भी उसका सम्मान बना रहना चाहिए। बता दें कि गाजियाबाद के हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस दर्दनाक हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद से वह अचेत अवस्था में हैं। पिछले कई वर्षों से वह बिस्तर पर ही पड़े रहे। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने के कारण उनके शरीर पर घाव भी बन गए, जिससे उनकी तकलीफ और बढ़ती चली गई। UP News
UP News : उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। करीब 13 साल से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। शीर्ष अदालत ने माना कि जब किसी मरीज के स्वस्थ होने की कोई वास्तविक संभावना न हो और वह लंबे समय से असहनीय चिकित्सकीय स्थिति में हो, तब उसे गरिमा के साथ विदाई देने पर विचार किया जा सकता है।
एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में होगी पूरी प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराया जाएगा। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चिकित्सा सहायता को चरणबद्ध तरीके से वापस लिया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी संवेदनशीलता, गरिमा और मानवीय सम्मान के साथ संपन्न की जानी चाहिए। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिजनों की स्थिति पर भी गंभीरता से विचार किया। उत्तर प्रदेश के इस परिवार ने वर्षों तक बेटे की सेवा की, लेकिन लगातार बिगड़ती हालत और शून्य सुधार की संभावना ने उन्हें मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया। हरीश के माता-पिता ने अदालत से अनुरोध किया था कि उनके बेटे को ऐसी अवस्था में अनंत पीड़ा में न रखा जाए और उसे इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए।
मेडिकल रिपोर्ट ने भी नहीं छोड़ी उम्मीद
एम्स की ओर से पेश मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक उनकी स्थिति लाइलाज है और लंबे समय से चेतना वापस आने के कोई संकेत नहीं मिले हैं। इसी तथ्य को आधार बनाते हुए अदालत ने मामले को केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी परखा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला ने टिप्पणी की कि यह अत्यंत दुखद और पीड़ादायक परिस्थिति है। अदालत के लिए ऐसा निर्णय लेना कभी आसान नहीं होता, लेकिन किसी व्यक्ति को वर्षों तक ऐसी अवस्था में बनाए रखना भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता, जब उसके ठीक होने की कोई संभावना न बची हो। अदालत ने यह भी माना कि जीवन की गरिमा केवल जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु के क्षण में भी उसका सम्मान बना रहना चाहिए। बता दें कि गाजियाबाद के हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस दर्दनाक हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद से वह अचेत अवस्था में हैं। पिछले कई वर्षों से वह बिस्तर पर ही पड़े रहे। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने के कारण उनके शरीर पर घाव भी बन गए, जिससे उनकी तकलीफ और बढ़ती चली गई। UP News












