बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना को क्यों झेलनी पड़ रही है भारी मार? रक्षा मंत्री ने खुद मानी सच्चाई

पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर गंभीर हिंसा की चपेट में है। हाल ही में प्रांत के दर्जनभर से ज्यादा शहरों में हुए एकसाथ और योजनाबद्ध हमलों ने यह साफ कर दिया है कि हालात सिर्फ बिगड़े नहीं हैं, बल्कि सेना और सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है।

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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar03 Feb 2026 07:05 PM
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Pak-Baloch Conflict : पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर गंभीर हिंसा की चपेट में है। हाल ही में प्रांत के दर्जनभर से ज्यादा शहरों में हुए एकसाथ और योजनाबद्ध हमलों ने यह साफ कर दिया है कि हालात सिर्फ बिगड़े नहीं हैं, बल्कि सेना और सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है। इन हमलों में सैन्य प्रतिष्ठानों, पुलिस पोस्टों, अर्धसैनिक बलों के कैंप और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। चौंकाने वाली बात यह रही कि इन हमलों में आत्मघाती हमलावरों के साथ-साथ महिला लड़ाके भी शामिल थीं। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में जो बयान दिया, उसने खुद पाकिस्तानी सत्ता तंत्र की पोल खोल दी।

विशाल भूभाग, नाममात्र आबादी सेना के लिए सबसे बड़ी परेशानी

ख्वाजा आसिफ ने स्वीकार किया कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा घेरता है। इसके मुकाबले यहां जनसंख्या बेहद कम है। कई इलाकों में तो दर्जनों किलोमीटर तक कोई बस्ती नहीं मिलती।

इतने बड़े और वीरान इलाके में सुरक्षा बलों की प्रभावी तैनाती मुश्किल हो जाती है। विद्रोही समूह आसानी से छिप जाते हैं, निगरानी और खुफिया नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि सेना की मौजूदगी के बावजूद उग्रवादी हमले लगातार हो रहे हैं।

सत्ता, अपराध और प्रशासन की खतरनाक सांठगांठ

रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि बलूचिस्तान की समस्या सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बल्कि अंदरूनी मिलीभगत की भी है। उनके अनुसार कुछ कबीलाई नेता, सरकारी अफसर और संगठित अपराधी आपस में जुड़े हुए हैं। यह गठजोड़ अलगाववादी संगठनों को न केवल पैसा मुहैया कराता है, बल्कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण भी देता है। उन्होंने साफ कहा कि जो आंदोलन कभी अधिकारों और पहचान की बात करता था, वह अब अपराधियों और तस्करों के हाथों में चला गया है।

तेल और माल की तस्करी से आतंक को मिल रहा ईंधन

ख्वाजा आसिफ के मुताबिक, बलूचिस्तान में तस्करी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है। खासकर तेल की अवैध तस्करी, अफगानिस्तान के लिए आने वाले ट्रांजिट माल को पाकिस्तान में ही बेच देना, इन गतिविधियों से रोजाना अरबों रुपये की कमाई हो रही है। यही पैसा हथियार खरीदने लड़ाकों की भर्ती और बड़े हमलों की योजना में लगाया जा रहा है। जब सरकार ने इस अवैध कारोबार पर शिकंजा कसने की कोशिश की, तो सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे।

भारी नुकसान के बावजूद नियंत्रण नहीं

रक्षा मंत्री ने दावा किया कि सुरक्षा बलों ने हालिया कार्रवाई में बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। कई जवान और आम नागरिक हिंसा की भेंट चढ़ गए। उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकार और लापता लोगों का मुद्दा अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जबकि इस पूरे नेटवर्क के असली संचालक देश से बाहर लग्जरी जिंदगी जी रहे हैं। ख्वाजा आसिफ के बयान से यह साफ झलकता है कि बलूचिस्तान में हालात सिर्फ हथियारों से नहीं सुधरेंगे।

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दलाई लामा को ग्रैमी अवॉर्ड मिलने से चीन बिलबिलाया

दलाई लामा का यह एल्बम संगीत से ज्यादा विचारों और भावनाओं पर केंद्रित है। इसमें उन्होंने जीवन, अहिंसा, मानसिक शांति और मानव मूल्यों पर अपने विचार साझा किए हैं। ग्रैमी जूरी ने इसे वैश्विक स्तर पर प्रेरणादायक और समाज को सकारात्मक दिशा देने वाला बताया।

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तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar02 Feb 2026 07:02 PM
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Grammy-Award : तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को उनके स्पोकन-वर्ड एल्बम के लिए 68वें ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह अवॉर्ड ध्यान, करुणा और मानवता के संदेशों पर आधारित उनकी रचनाओं के लिए दिया गया। इस उपलब्धि को दुनिया भर में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।

स्पोकन-वर्ड एल्बम के जरिए शांति और करुणा का संदेश

दलाई लामा का यह एल्बम संगीत से ज्यादा विचारों और भावनाओं पर केंद्रित है। इसमें उन्होंने जीवन, अहिंसा, मानसिक शांति और मानव मूल्यों पर अपने विचार साझा किए हैं। ग्रैमी जूरी ने इसे वैश्विक स्तर पर प्रेरणादायक और समाज को सकारात्मक दिशा देने वाला बताया।

ग्रैमी अवॉर्ड पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया

दलाई लामा को ग्रैमी अवॉर्ड मिलने के बाद चीन ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। बीजिंग ने आरोप लगाया कि दलाई लामा धर्म की आड़ में राजनीतिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। चीन का कहना है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान तिब्बत से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश हैं।

धर्म की आड़ में राजनीति का आरोप क्यों लगाया चीन ने?

चीन लंबे समय से दलाई लामा को अलगाववादी नेता मानता रहा है। ग्रैमी अवॉर्ड को लेकर भी चीन ने यही दोहराया कि यह सम्मान धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। चीन के अनुसार, ऐसे कदम उसकी संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के समान हैं।

वैश्विक मंच पर दलाई लामा की लोकप्रियता बरकरार

चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा को दुनिया भर में व्यापक सम्मान मिलता रहा है। मानवाधिकार, शांति और संवाद के प्रतीक के रूप में उनकी छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत है। ग्रैमी अवॉर्ड को भी उनके वैश्विक प्रभाव और विचारों की स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। ग्रैमी अवॉर्ड मिलने के बाद दलाई लामा ने इसे व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि करुणा और शांति के विचारों की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन मूल्यों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी देता है, जिन पर मानवता टिकी है। इस अवॉर्ड के बाद तिब्बत और चीन के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा तेज हो गई है। जहां एक ओर चीन नाराज है, वहीं दूसरी ओर कई देश और संगठन इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आध्यात्मिक विचारों की जीत मान रहे हैं।


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बालाघाट के प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल से 7 साल बाद रिहा, बहन की मेहनत रंग लाई

प्रसन्नजीत रंगारी आखिरकार पाकिस्तान की जेल से रिहा हो गए। पिछले 7 साल से वे पाकिस्तान में सुनील अदे के नाम से बंद थे। उनकी बहन संघमित्रा पिछले पांच साल से लगातार उनके घर वापसी के लिए प्रयासरत थीं। संघमित्रा के अनथक प्रयासों के कारण ही आखिरकार प्रसन्नजीत पाकिस्तान जेल से छूटकर भारत लौट सके।

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प्रसन्नजीत और उनकी बहन संघमित्रा
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar02 Feb 2026 05:29 PM
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Pakistani Prison : बालाघाट के प्रसन्नजीत रंगारी आखिरकार पाकिस्तान की जेल से रिहा हो गए। पिछले 7 साल से वे पाकिस्तान में सुनील अदे के नाम से बंद थे। उनकी बहन संघमित्रा पिछले पांच साल से लगातार उनके घर वापसी के लिए प्रयासरत थीं। संघमित्रा के अनथक प्रयासों के कारण ही आखिरकार प्रसन्नजीत पाकिस्तान जेल से छूटकर भारत लौट सके। भले ही उन्हें 7 सालों तक पाकिस्तानी जेल की यातनाएं सहनी पड़ी लेकिन आखिर उन्हें अपने देश की मिट्टी नसीब हो ही गई।

कई सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए और नेताओं से मांगी मदद

संघमित्रा ने कई सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाया और कई नेताओं से मदद मांगी। साल 2021 में उन्होंने प्रसन्नजीत के लिए एक पत्र लिखा, जिसे लोकल 18 ने प्रकाशित किया और यह खबर धीरे-धीरे राष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियों में आ गई। यह प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा के द्वारा लिखा गया पत्र ही था जिसने इस घटना को उजागर किया और राष्टÑीय मीडिया की सुर्खियों में आ जाने का कारण बनी। और अंत में पाकिस्तान की जेल से उसके भाई प्रसन्नजीत की रिहाई हो सकी।

प्रसन्नजीत को अमृतसर जाकर लाने की हो रही है तैयारी 

31 जनवरी को पाकिस्तान ने सात भारतीय नागरिकों को रिहा किया, जिनमें से छह पंजाब के थे और एक बालाघाट का प्रसन्नजीत। उनके रिहाई की खबर मिलने पर संघमित्रा बेहद खुश हुईं। 1 फरवरी को उन्हें खैरलांजी पुलिस स्टेशन से रिहाई की जानकारी मिली। फोन पर भाई की आवाज सुनते ही संघमित्रा भावुक हो गईं, हालांकि भाई ने उनकी आवाज तुरंत पहचानी। संघमित्रा को यह दुख है कि उनके पिता के जिंदा रहते वह भाई को घर नहीं ला सके। अब प्रसन्नजीत जल्द ही बालाघाट लौटेंगे, प्रसन्नजीत को उनके जीजा राजेश अमृतसर जाकर उन्हें लाने की तैयारी कर रहे हैं।

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