लोग कहते हैं दुबई सेफ है, तो हमसे दुश्मनी करके कहीं भी सेफ नहीं है। यही वाक्य एक बड़ा सवाल सामने रखता है – आखिर क्या वजह है कि इतने सारे गैंगस्टर दुनिया की तमाम जगहों में से दुबई को ही अपना ठिकाना और ऑपरेशन बेस चुनते हैं?

दुबई, जिसे कभी अंडरवर्ल्ड के लिए सबसे सुरक्षित ठिकानों में गिना जाता था, अब भारतीय गैंगस्टरों की खूनी रंजिश का नया अड्डा बनता नजर आ रहा है। ताज़ा प्रकरण गैंगस्टर रोहित गोदारा के उस सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें उसने लॉरेंस बिश्नोई गैंग के करीबी सहयोगी जोरा सिद्धू उर्फ सिप्पा की हत्या की जिम्मेदारी लेने का दावा किया है। पोस्ट में कहा गया कि सिद्धू का गला रेतकर ख़ात्मा किया गया। आरोप यह भी लगाया गया कि जर्मनी में गोदारा के भाई पर हमला करवाने की साज़िश के पीछे भी सिद्धू ही था। दावा है कि वह दुबई में बैठकर कनाडा और अमेरिका में लॉरेंस बिश्नोई के नाम पर धमकियां दिलवा रहा था और वसूली का नेटवर्क चला रहा था। गोदारा ने इस “क्लेम पोस्ट” में गोल्डी बराड़, वीरेंद्र चारण, महेंद्र सारण डेलाणा और विक्की पहलवान कोटकपुरा के नाम भी खुले तौर पर लिखे, जिसे यूएई की जमीन पर भारतीय गैंगस्टरों के बीच उभरते पहले बड़े गैंगवार एपिसोड के तौर पर देखा जा रहा है। यह इशारा साफ है कि जो गैंग टकराहट अब तक कनाडा–अमेरिका की गलियों तक सीमित थी, उसकी आग अब दुबई तक लपकने लगी है। दिलचस्प यह है कि दुबई पुलिस ने इस कथित हत्या की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन गोदारा की पोस्ट की एक लाइन ने बहस तेज कर दी – लोग कहते हैं दुबई सेफ है, तो हमसे दुश्मनी करके कहीं भी सेफ नहीं है। यही वाक्य एक बड़ा सवाल सामने रखता है – आखिर क्या वजह है कि इतने सारे गैंगस्टर दुनिया की तमाम जगहों में से दुबई को ही अपना ठिकाना और ऑपरेशन बेस चुनते हैं?
अंतरराष्ट्रीय अपराध जगत में दुबई का नाम नया नहीं है। भारतीय अंडरवर्ल्ड की बात करें तो दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क की कहानी दुबई से होकर ही गुजरती है। 1984 में मुंबई पुलिस और विरोधी गिरोहों के दबाव के बीच दाऊद दुबई शिफ्ट हुआ था और यहीं से उसने अपना साम्राज्य फैलाया। कहा जाता है कि उसी दौर में उसने अपने भरोसेमंद साथी छोटा शकील को कारोबार की कमान सौंपी। 1993 मुंबई ब्लास्ट की साजिश से लेकर अंडरवर्ल्ड की कई बड़ी बैठकों के संदर्भ में दुबई का नाम बार–बार सामने आता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दुबई अपराधियों के लिए इसलिए भी आकर्षक रहा क्योंकि यहां प्रत्यर्पण (एक्सट्रडिशन) संधियां सीमित हैं, कई देशों के लिए किसी आरोपी को वापस लाना कानूनी और कूटनीतिक रूप से मुश्किल हो जाता है और कुछ मामलों में स्थानीय सिस्टम उन पर तुरंत शिकंजा नहीं कस पाता। इसी खालीपन का फायदा उठाकर कई हिस्ट्रीशीटर, गैंग लीडर और फाइनेंशियल क्रिमिनल्स ने दुबई को अपनी “सेफ डेन” बना लिया।
कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह बात बार–बार सामने आती रही है कि दुबई की ढीली वित्तीय रेग्युलेशन, फ्री ट्रेड ज़ोन की सुविधा और हवाला जैसे अनौपचारिक नेटवर्क ने मनी लॉन्ड्रिंग को बेहद आसान बना दिया है। यहीं वजह है कि गैंगस्टर और सफेदपोश अपराधी अक्सर काले धन को रियल एस्टेट में पार्क कर देते हैं, महंगे फ्लैट, दफ़्तर और कॉमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदकर संदिग्ध कैश को कागज़ों में “लीगल इनकम” में बदल लेते हैंऔर कई बार धन के असली सोर्स पर सख़्त जांच न होने से उन्हें मनचाहा स्पेस मिल जाता है। लोकल पुलिस का फोकस भी ज़्यादातर उन मामलों पर होता है, जिनका सीधा ताल्लुक दुबई की जमीन से हो। ऐसे में अगर कोई गैंगस्टर यहां बैठकर विदेशों में धमकी, वसूली या गैंग नेटवर्क ऑपरेट कर रहा हो, तो वह सालों तक रडार से नीचे उड़ान भर सकता है। यही कारण है कि दुबई लंबे समय तक दूर–दराज़ बैठे क्रिमिनल नेटवर्क के लिए “ऑपरेशन कंट्रोल रूम” की तरह काम करता रहा है।
दुबई का नक्शे पर लोकेशन ही गैंगस्टरों के लिए बोनस जैसा है। खाड़ी के इस शहर से यूरोप, एशिया और अफ्रीका – तीनों दिशाओं में सीधी और तेज़ कनेक्टिविटी मिलती है, इसलिए यहां से उड़ान भरकर या उतारकर नेटवर्क चलाना आसान हो जाता है। शिपिंग रूट्स, पोर्ट्स और एयर कार्गो की वजह से यह शहर ड्रग्स और दूसरे अवैध कारोबार के लिए नैचुरल लॉजिस्टिक हब बन चुका है। ऊपर से दुनिया के लगभग हर मुल्क के लोग यहां बसे हैं, तो कोई भी गैंगस्टर आसानी से भीड़ में गुम हो सकता है, बिना ज़्यादा शक पैदा किए। यही कारण है कि कनाडा, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सक्रिय कई गिरोह दुबई को सालों से अपने “ट्रांज़िट प्वाइंट” और “सेफ ऑपरेशन बेस” के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं।
पिछले कुछ साल में दुबई की तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दी है। 2022 में यूएई के FATF (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की ग्रे लिस्ट में आने के बाद मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग पर नकेल कसने का दबाव अचानक कई गुना बढ़ गया। इसके बाद अरब अमीरात ने एंटी मनी लॉन्ड्रिंग कानून सख्त किए, संदिग्ध वित्तीय लेन–देन पर पैनी नजर रखनी शुरू की और इंटरपोल समेत अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ तालमेल तेज कर दिया। इसी दौर में दुबई की चमक–दमक के बीच कई बड़े अपराधियों की गिरफ़्तारी ने दुनिया का ध्यान खींचा। स्कॉटलैंड के कुख्यात गैंग लीडर स्टीवन लायंस यहीं दबोचा गया (भले बाद में उसे राहत मिल गई), शिपिंग कंटेनरों के ज़रिए ड्रग्स तस्करी संभालने वाला इंटरनेशनल कोकीन तस्कर एल बल्लौटी भी यहीं पकड़ा गया। इंटरपोल की रिपोर्ट के अनुसार आयरलैंड के “मोस्ट वांटेड” अपराधी मैकगवर्न को भी 2024 में UAE में ही मर्डर और ऑर्गनाइज्ड क्राइम के केस में गिरफ्तार किया गया। इन कार्रवाइयों ने ये साफ संकेत दिया कि दुबई अब पहले जैसा “नो क्वेश्चन आस्क्ड” वाला सेफ हब नहीं बचा, और आर्थिक साख बचाने के लिए सिस्टम को एक्टिव मोड में आना ही पड़ा। फिर भी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सख्ती के बावजूद दुबई की आर्थिक संरचना, उसकी ग्लोबल कनेक्टिविटी और यहां बसने वाली मल्टी–नेशनल आबादी अब भी अपराधियों के लिए एक तरह की नैचुरल शील्ड तैयार कर देती है। नतीजा यह है कि दुबई आज भी कई गैंगस्टरों के लिए सिर्फ “छिपने की पनाहगाह” नहीं, बल्कि नए गैंगवार की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। रोहित गोदारा बनाम लॉरेंस बिश्नोई गैंग का ताज़ा एपिसोड इसी बड़े और खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है।