Iran Protest: ईरान इस वक्त करीब एक हफ्ते से आर्थिक बदहाली और राजनीतिक बेचैनी के दोहरे दबाव में सुलग रहा है। चिंगारी दिसंबर के आखिर में तेहरान के ग्रैंड बाजार से उठी जहां दुकानदारों की हड़ताल ने देखते ही देखते विरोध की लपटों को देश के कई शहरों तक फैला दिया। तेज़ी से गिरता रियाल, 42–50% की महंगाई, आयातित सामान की उछलती कीमतें और आम लोगों की घटती क्रय-शक्ति इस आक्रोश की मूल वजह बताई जा रही हैं। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डॉलर के मुकाबले रियाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि 1 डॉलर करीब 1.42 मिलियन रियाल के आसपास कारोबार कर रहा है।
छात्रों की एंट्री से आंदोलन को मिला नया तेवर
लेकिन अब यह आंदोलन सिर्फ महंगाई का विरोध नहीं रहा। सड़कों पर उठ रहे नारों में अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सत्ता को चुनौती देने का स्वर भी साफ सुनाई दे रहा है सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ नारे और कहीं-कहीं शाह समर्थक आवाजें भी सामने आई हैं। छात्रों की सक्रिय भागीदारी, फार्स प्रांत में सरकारी भवन पर हमले की खबरें और पुलिस द्वारा टीयर गैस के इस्तेमाल ने माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण बना दिया है। इसी बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को स्वीकारते हुए सेंट्रल बैंक गवर्नर को हटाने और प्रतिनिधियों से बातचीत का संकेत दिया, जबकि प्रॉसीक्यूटर जनरल ने “असुरक्षा फैलाने” वालों पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दे दी। उधर, निर्वासित रेज़ा पहलवी का समर्थन और अमेरिका-इजरायल के शीर्ष नेताओं की टिप्पणियां इस संकट को अंतरराष्ट्रीय फोकस में ले आई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि 2022 के ‘Women, Life, Freedom’ आंदोलन के बाद यह ईरान में सबसे बड़ा उभार है और अब बड़ा सवाल यही है कि यह उबाल किस दिशा में मोड़ लेता है।
प्रदर्शन धीरे-धीरे ठंडे पड़ सकते हैं
फिलहाल सत्ता का रवैया पूरी तरह “ऑल-आउट क्रैकडाउन” वाला नहीं दिख रहा। राष्ट्रपति की बातचीत की पेशकश, सेंट्रल बैंक में बदलाव जैसे संकेत बताता है कि सरकार तनाव कम करने की कोशिश कर रही है। यदि रियाल में थोड़ी स्थिरता आती है और सब्सिडी/कर राहत या कीमतों पर कुछ नियंत्रण जैसे तात्कालिक कदम घोषित किए जाते हैं, तो विरोध कुछ सप्ताह में कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की कमी है। यदि प्रदर्शन “आर्थिक” से आगे बढ़कर सीधे सत्ता परिवर्तन या सुप्रीम लीडर के खिलाफ निर्णायक चुनौती में बदलते हैं, तो सुरक्षा तंत्र कठोर रुख अपना सकता है। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, इंटरनेट पर नियंत्रण/ब्लैकआउट, और व्यापक सुरक्षा तैनाती जैसे कदम संभव हैं। ऐसे हालात में सरकार विदेशी हस्तक्षेप का नैरेटिव भी मजबूत कर सकती है जिससे तुरंत नियंत्रण तो हो सकता है, लेकिन लंबे समय में जनता का गुस्सा और गहरा हो सकता है।
आंशिक सुधारों का रास्ता
पेजेश्कियन की सुधारवादी छवि का इस्तेमाल कर सत्ता कुछ व्यावहारिक आर्थिक फैसले ले सकती है। तेल निर्यात को बढ़ाने की कोशिश, चीन-रूस के साथ व्यापार पर जोर, सब्सिडी/बजट में कुछ राहत, या 2026 के बजट में कर-भार कम करने जैसे संकेत। यदि मध्यम वर्ग और व्यापारियों को लगे कि राहत वास्तविक है, तो विरोध की तीव्रता घट सकती है और सरकार इसे “जनता की सुनवाई” के रूप में प्रस्तुत कर स्थिरता का दावा कर सकती है। मगर प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के रहते बड़े और गहरे सुधार आसान नहीं होंगे।
आंदोलन का व्यापक फैलाव
अगर छात्र, मजदूर, व्यापारी और शहरी मध्यवर्ग एक साथ लंबे समय तक सड़क पर टिकते हैं, तो आंदोलन 1979 जैसी “मोमेंटम पॉलिटिक्स” का रूप ले सकता है। ऐसे में नेतृत्व संकट, सुरक्षा बलों में मतभेद, और प्रशासनिक मशीनरी में दरारें ये सब जोखिम बढ़ा सकते हैं। रेज़ा पहलवी जैसे निर्वासित चेहरों का समर्थन और विदेशी नेताओं की बयानबाजी आंदोलन को नैतिक/राजनीतिक ऊर्जा दे सकती है, पर यह सरकार को “बाहरी एजेंडा” का नैरेटिव चलाने का मौका भी देगी। यदि सुरक्षा तंत्र में विभाजन होता है, तो सत्ता के लिए चुनौती कई गुना बढ़ सकती है।
बाहरी हस्तक्षेप या क्षेत्रीय टकराव
यदि हालात बिगड़ते हैं, तो अमेरिका-इजरायल जैसे बाहरी खिलाड़ी ईरान के परमाणु/मिसाइल कार्यक्रम या सुरक्षा चिंताओं को आधार बनाकर दबाव बढ़ा सकते हैं । ऐसी स्थिति में सरकार “राष्ट्रीय एकता” और “विदेशी साजिश” का तर्क देकर प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश करेगी, लेकिन बाहरी दबाव बढ़ने पर अर्थव्यवस्था और कमजोर हो सकती है जिससे अस्थिरता का चक्र लंबा चलने का खतरा रहेगा। Iran Protest