भारत की शिक्षक रूबल नागी ने जीता ग्लोबल टीचर प्राइज 2026, इनाम में मिले 9 करोड़ रुपये

रूबल नागी एक शिक्षिका, समाजसेवी और कलाकार हैं। उन्होंने अपनी रूबल नागी आर्ट फाउंडेशन के जरिए भारत के विभिन्न शहरों में 800 से अधिक लर्निंग सेंटर स्थापित किए हैं। इन केंद्रों में वंचित और स्लम क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा और सीखने के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं।

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ग्लोबल टीचर प्राइज लेते भारत की शिक्षिका रूबल नागी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar08 Feb 2026 06:07 PM
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Global Teacher Prize : भारत की रूबल नागी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन करते हुए ग्लोबल टीचर प्राइज 2026 जीत लिया है। यह पुरस्कार उन्हें दुबई में आयोजित वर्ल्ड गवर्नमेंट सम्मिट 2026 में प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के साथ उन्हें लगभग 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 9 करोड़ रुपये) की राशि भी दी गई।

रूबल नागी कौन हैं?

रूबल नागी एक शिक्षिका, समाजसेवी और कलाकार हैं। उन्होंने अपनी रूबल नागी आर्ट फाउंडेशन के जरिए भारत के विभिन्न शहरों में 800 से अधिक लर्निंग सेंटर स्थापित किए हैं। इन केंद्रों में वंचित और स्लम क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा और सीखने के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं। रूबल ने बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को और रोचक बनाने के लिए खाली दीवारों पर शिक्षण म्यूरल्स (चित्र आधारित शिक्षा) तैयार किए। यह तरीका बच्चों के लिए पढ़ाई को अधिक सुलभ और समझने में आसान बनाता है। उनके इस अनूठे दृष्टिकोण ने लाखों बच्चों की शिक्षा तक पहुँच बनाई है।

ग्लोबल टीचर प्राइज की खासियत

ग्लोबल टीचर प्राइज को वार्के फाउंडेशन और जेम्स एजूकेशन द्वारा दिया जाता है। यह पुरस्कार उन शिक्षकों को सम्मानित करता है जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया हो। रूबल नागी ने हजारों नामांकनों में से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक के रूप में यह पुरस्कार प्राप्त किया।

पुरस्कार राशि और उपयोग

रूबल नागी को मिले पुरस्कार की राशि का उद्देश्य शिक्षा के विस्तार और वंचित बच्चों के लिए नए शिक्षण केंद्र स्थापित करना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह राशि बच्चों के मुफ्त प्रशिक्षण और शिक्षा कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल की जाएगी।

उनका काम क्यों अनोखा है?

रूबल का काम शिक्षा को अधिक पहुँच योग्य और रोचक बनाने की दिशा में एक नया मॉडल पेश करता है। उन्होंने जहां संसाधनों की कमी थी, वहां दीवारों को कक्षाओं में बदलकर बच्चों को सीखने के अवसर दिए। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई में सुधार हुआ, बल्कि उनके जीवन में भी सकारात्मक बदलाव आया। रूबल नागी की यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत रूप से उनके लिए गर्व की बात है, बल्कि पूरे भारत के लिए शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक पहचान का प्रतीक भी है।Global Teacher Prize


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क्या खतरे में हैं किसान? US ट्रेड डील पर सरकार का सच आया सामने

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर चल रहे विवाद के बीच कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि इस डील में भारतीय किसानों, डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी प्रोडक्ट शामिल नहीं है।

India US Trade Deal
भारत-अमेरिका ट्रेड डील
locationभारत
userअसमीना
calendar08 Feb 2026 11:55 AM
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भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर देश में लगातार बहस चल रही है। कई लोगों को डर है कि इस समझौते से भारतीय किसानों, डेयरी सेक्टर और कृषि उत्पादों को नुकसान हो सकता है। इन्हीं सवालों के बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़ा बयान देकर तस्वीर साफ कर दी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे के मुताबिक इस ट्रेड डील में किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। सरकार ने साफ किया है कि जिन चीजों से भारतीय किसान प्रभावित हो सकते थे उन्हें डील से बाहर रखा गया है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्यों मचा है विवाद?

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस समझौते से विदेशी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में आ सकते हैं। इसी विवाद के बीच शिवराज सिंह चौहान ने साफ शब्दों में कहा कि यह डील देश को झुकाने वाली नहीं बल्कि भारत के हित में बनाई गई है।

किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं

कृषि मंत्री ने कहा कि पीएम मोदी पहले ही साफ कर चुके हैं कि किसानों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि खेती और कृषि से जुड़े ऐसे किसी भी प्रोडक्ट को ट्रेड डील में शामिल नहीं किया गया है जिससे भारतीय किसानों को घाटा हो।

ये कृषि उत्पाद US ट्रेड डील से पूरी तरह बाहर

शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक इस ट्रेड डील में सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, तिलहन, इथेनॉल और तंबाकू जैसे अहम उत्पाद शामिल नहीं हैं। इन सभी पर अमेरिका को किसी भी तरह की टैरिफ छूट नहीं दी गई है।

डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित

डेयरी और पोल्ट्री को लेकर किसानों की चिंता सबसे ज्यादा थी। इस पर मंत्री ने साफ किया कि दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी, पनीर, चीज, क्रीम, बटर ऑयल जैसे किसी भी डेयरी प्रोडक्ट का भारत में इंपोर्ट नहीं होगा। पोल्ट्री सेक्टर भी पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

फल और दालें भी ट्रेड डील से बाहर

सरकार ने केले, स्ट्रॉबेरी, चेरी, खट्टे फल, हरी मटर, काबुली चना और मूंग जैसी फसलों को भी इस डील से बाहर रखा है। इसका मकसद साफ है भारतीय किसानों और बागवानी सेक्टर को किसी भी तरह का नुकसान न हो। शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक कहा कि अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार नहीं खोला गया है। यानी भारत ने अपने किसानों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा है और अमेरिका को किसी तरह की विशेष छूट नहीं दी गई।

भारत के कृषि उत्पादों को मिलेगा बड़ा फायदा

जहां एक तरफ अमेरिकी प्रोडक्ट्स को छूट नहीं मिली, वहीं दूसरी तरफ भारत से कई कृषि उत्पाद अमेरिका को जीरो ड्यूटी पर एक्सपोर्ट किए जाएंगे। इससे भारतीय किसानों और निर्यातकों की आमदनी बढ़ने की उम्मीद है। कृषि मंत्री ने बताया कि भारत के मसालों का एक्सपोर्ट 88 फीसदी तक बढ़ गया है। भारत अब दुनिया के करीब 200 देशों को मसाले और उनसे जुड़े प्रोडक्ट्स भेज रहा है जिससे किसानों को सीधा फायदा मिल रहा है।

अमेरिका ने घटाया भारत का टैरिफ

शिवराज सिंह चौहान के अनुसार अमेरिका ने कई भारतीय कृषि उत्पादों पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 0 कर दिया है। इससे भारत के एग्रीकल्चर और टेक्सटाइल सेक्टर को मजबूती मिलेगी। इस ट्रेड डील का फायदा सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। मंत्री ने कहा कि इससे टेक्सटाइल सेक्टर मजबूत होगा और सेल्फ-हेल्प ग्रुप से जुड़ी महिलाओं की आय और जिंदगी दोनों बेहतर होंगी। अपने बयान के आखिर में शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा कि सरकार ने किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाने वाला कोई कदम नहीं उठाया है। ट्रेड डील को लेकर लगाए जा रहे सभी आरोप बेबुनियाद हैं।

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कोरियन ड्रामा का असर : छात्रों में क्रेज, इंजीनियरिंग की छात्रा हुई शिकार

रोमांटिक कहानियां, भावनात्मक संवाद, परफेक्ट लुक्स और अलग जीवनशैली युवाओं को अपनी ओर खींचती है। हाल ही में गोरखपुर की एक इंजीनियरिंग छात्रा से जुड़ा मामला इसी बदलते ट्रेंड पर बहस की वजह बना है।

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कोरियन ड्रामा
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar07 Feb 2026 07:16 PM
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korean-Dramas : पिछले कुछ वर्षों में भारत के युवाओं, खासकर कॉलेज छात्रों के बीच कोरियन ड्रामा और के-पॉप का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। रोमांटिक कहानियां, भावनात्मक संवाद, परफेक्ट लुक्स और अलग जीवनशैली युवाओं को अपनी ओर खींचती है। हाल ही में गोरखपुर की एक इंजीनियरिंग छात्रा से जुड़ा मामला इसी बदलते ट्रेंड पर बहस की वजह बना है।

जब मनोरंजन आदत बन जाए

बताया गया कि छात्रा रोजाना कई घंटे कोरियन ड्रामा और फिल्में देखने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी बोलचाल में विदेशी शब्द आने लगे, पहनावे और मेकअप में भी बदलाव दिखने लगा। यह सब अपने आप में असामान्य नहीं है, क्योंकि युवा अवस्था में लोग नई पहचान तलाशते हैं और पसंदीदा किरदारों से प्रभावित होना स्वाभाविक है। समस्या तब सामने आई जब यह रुचि पढ़ाई और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों पर भारी पड़ने लगी। परीक्षा में अंक गिरने लगे और परिवार को चिंता हुई, जिसके बाद काउंसलिंग की जरूरत महसूस की गई।

प्रभाव और लत के बीच की रेखा

किसी संस्कृति, भाषा या कला से प्रभावित होना गलत नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने बिताने लगे, नींद, पढ़ाई और सामाजिक जीवन प्रभावित होने लगे, तब यह एक चेतावनी बन जाती है। यही फर्क है रुचि और लत के बीच। कोरियन ड्रामा हो या आॅनलाइन गेम ये केवल माध्यम हैं। असल चुनौती है बढ़ता स्क्रीन टाइम, भावनात्मक अकेलापन और युवाओं के पास सीमित रचनात्मक विकल्प।

सिर्फ कंटेंट को दोष देना आसान है

अक्सर ऐसी घटनाओं में सारा दोष विदेशी कंटेंट या मोबाइल फोन पर डाल दिया जाता है। लेकिन यह एकतरफा सोच है। अगर संवाद, मार्गदर्शन और संतुलन मौजूद हो, तो वही कंटेंट सीखने और मनोरंजन का साधन भी बन सकता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों और युवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय उनसे खुलकर बात करना ज्यादा प्रभावी होता है। समय तय करना, दिनचर्या बनाना और खेल, संगीत या किताबों जैसे विकल्प देना व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

माता-पिता और संस्थानों की भूमिका

परिवार और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समय रहते बदलावों को समझें। चिड़चिड़ापन, अकेलापन या पढ़ाई में लगातार गिरावट जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर काउंसलर या विशेषज्ञ की मदद लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। कोरियन ड्रामा या किसी भी विदेशी संस्कृति से प्रभावित होना न तो अपराध है और न ही मानसिक समस्या। असली सवाल है संतुलन का। जब मनोरंजन जीवन को नियंत्रित करने लगे, तब हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। युवाओं को समझ, समर्थन और सही दिशा मिले तो क्रेज कभी पागलपन नहीं बनता।


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