बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना को क्यों झेलनी पड़ रही है भारी मार? रक्षा मंत्री ने खुद मानी सच्चाई
पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर गंभीर हिंसा की चपेट में है। हाल ही में प्रांत के दर्जनभर से ज्यादा शहरों में हुए एकसाथ और योजनाबद्ध हमलों ने यह साफ कर दिया है कि हालात सिर्फ बिगड़े नहीं हैं, बल्कि सेना और सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है।

Pak-Baloch Conflict : पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर गंभीर हिंसा की चपेट में है। हाल ही में प्रांत के दर्जनभर से ज्यादा शहरों में हुए एकसाथ और योजनाबद्ध हमलों ने यह साफ कर दिया है कि हालात सिर्फ बिगड़े नहीं हैं, बल्कि सेना और सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है। इन हमलों में सैन्य प्रतिष्ठानों, पुलिस पोस्टों, अर्धसैनिक बलों के कैंप और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। चौंकाने वाली बात यह रही कि इन हमलों में आत्मघाती हमलावरों के साथ-साथ महिला लड़ाके भी शामिल थीं। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में जो बयान दिया, उसने खुद पाकिस्तानी सत्ता तंत्र की पोल खोल दी।
विशाल भूभाग, नाममात्र आबादी सेना के लिए सबसे बड़ी परेशानी
ख्वाजा आसिफ ने स्वीकार किया कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा घेरता है। इसके मुकाबले यहां जनसंख्या बेहद कम है। कई इलाकों में तो दर्जनों किलोमीटर तक कोई बस्ती नहीं मिलती।
इतने बड़े और वीरान इलाके में सुरक्षा बलों की प्रभावी तैनाती मुश्किल हो जाती है। विद्रोही समूह आसानी से छिप जाते हैं, निगरानी और खुफिया नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि सेना की मौजूदगी के बावजूद उग्रवादी हमले लगातार हो रहे हैं।
सत्ता, अपराध और प्रशासन की खतरनाक सांठगांठ
रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि बलूचिस्तान की समस्या सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बल्कि अंदरूनी मिलीभगत की भी है। उनके अनुसार कुछ कबीलाई नेता, सरकारी अफसर और संगठित अपराधी आपस में जुड़े हुए हैं। यह गठजोड़ अलगाववादी संगठनों को न केवल पैसा मुहैया कराता है, बल्कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण भी देता है। उन्होंने साफ कहा कि जो आंदोलन कभी अधिकारों और पहचान की बात करता था, वह अब अपराधियों और तस्करों के हाथों में चला गया है।
तेल और माल की तस्करी से आतंक को मिल रहा ईंधन
ख्वाजा आसिफ के मुताबिक, बलूचिस्तान में तस्करी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है। खासकर तेल की अवैध तस्करी, अफगानिस्तान के लिए आने वाले ट्रांजिट माल को पाकिस्तान में ही बेच देना, इन गतिविधियों से रोजाना अरबों रुपये की कमाई हो रही है। यही पैसा हथियार खरीदने लड़ाकों की भर्ती और बड़े हमलों की योजना में लगाया जा रहा है। जब सरकार ने इस अवैध कारोबार पर शिकंजा कसने की कोशिश की, तो सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे।
भारी नुकसान के बावजूद नियंत्रण नहीं
रक्षा मंत्री ने दावा किया कि सुरक्षा बलों ने हालिया कार्रवाई में बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। कई जवान और आम नागरिक हिंसा की भेंट चढ़ गए। उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकार और लापता लोगों का मुद्दा अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जबकि इस पूरे नेटवर्क के असली संचालक देश से बाहर लग्जरी जिंदगी जी रहे हैं। ख्वाजा आसिफ के बयान से यह साफ झलकता है कि बलूचिस्तान में हालात सिर्फ हथियारों से नहीं सुधरेंगे।
Pak-Baloch Conflict : पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर गंभीर हिंसा की चपेट में है। हाल ही में प्रांत के दर्जनभर से ज्यादा शहरों में हुए एकसाथ और योजनाबद्ध हमलों ने यह साफ कर दिया है कि हालात सिर्फ बिगड़े नहीं हैं, बल्कि सेना और सरकार की पकड़ कमजोर होती जा रही है। इन हमलों में सैन्य प्रतिष्ठानों, पुलिस पोस्टों, अर्धसैनिक बलों के कैंप और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। चौंकाने वाली बात यह रही कि इन हमलों में आत्मघाती हमलावरों के साथ-साथ महिला लड़ाके भी शामिल थीं। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में जो बयान दिया, उसने खुद पाकिस्तानी सत्ता तंत्र की पोल खोल दी।
विशाल भूभाग, नाममात्र आबादी सेना के लिए सबसे बड़ी परेशानी
ख्वाजा आसिफ ने स्वीकार किया कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा घेरता है। इसके मुकाबले यहां जनसंख्या बेहद कम है। कई इलाकों में तो दर्जनों किलोमीटर तक कोई बस्ती नहीं मिलती।
इतने बड़े और वीरान इलाके में सुरक्षा बलों की प्रभावी तैनाती मुश्किल हो जाती है। विद्रोही समूह आसानी से छिप जाते हैं, निगरानी और खुफिया नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि सेना की मौजूदगी के बावजूद उग्रवादी हमले लगातार हो रहे हैं।
सत्ता, अपराध और प्रशासन की खतरनाक सांठगांठ
रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि बलूचिस्तान की समस्या सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बल्कि अंदरूनी मिलीभगत की भी है। उनके अनुसार कुछ कबीलाई नेता, सरकारी अफसर और संगठित अपराधी आपस में जुड़े हुए हैं। यह गठजोड़ अलगाववादी संगठनों को न केवल पैसा मुहैया कराता है, बल्कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण भी देता है। उन्होंने साफ कहा कि जो आंदोलन कभी अधिकारों और पहचान की बात करता था, वह अब अपराधियों और तस्करों के हाथों में चला गया है।
तेल और माल की तस्करी से आतंक को मिल रहा ईंधन
ख्वाजा आसिफ के मुताबिक, बलूचिस्तान में तस्करी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है। खासकर तेल की अवैध तस्करी, अफगानिस्तान के लिए आने वाले ट्रांजिट माल को पाकिस्तान में ही बेच देना, इन गतिविधियों से रोजाना अरबों रुपये की कमाई हो रही है। यही पैसा हथियार खरीदने लड़ाकों की भर्ती और बड़े हमलों की योजना में लगाया जा रहा है। जब सरकार ने इस अवैध कारोबार पर शिकंजा कसने की कोशिश की, तो सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे।
भारी नुकसान के बावजूद नियंत्रण नहीं
रक्षा मंत्री ने दावा किया कि सुरक्षा बलों ने हालिया कार्रवाई में बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। कई जवान और आम नागरिक हिंसा की भेंट चढ़ गए। उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकार और लापता लोगों का मुद्दा अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जबकि इस पूरे नेटवर्क के असली संचालक देश से बाहर लग्जरी जिंदगी जी रहे हैं। ख्वाजा आसिफ के बयान से यह साफ झलकता है कि बलूचिस्तान में हालात सिर्फ हथियारों से नहीं सुधरेंगे।












