ट्रंप की महत्वाकांक्षी परियोजना 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली बैठक
वॉशिंगटन डीसी में आयोजित इस ऐतिहासिक बैठक में भारतीय दूतावास में तैनात चार्ज डी' अफेयर्स नामग्या सी खम्पा ने देश का प्रतिनिधित्व किया। भारत का यह कदम उसकी विदेश नीति की सूझबूझ को दर्शाता है।

Board of Peace : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी पहल 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) की पहली बैठक में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्रदर्शित करते हुए एक संतुलित रुख अपनाया है। भारत ने इस नए अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ का पूर्ण सदस्य बनने के निमंत्रण पर तत्काल स्वीकृति नहीं दी, बल्कि सावधानी बरतते हुए 'पर्यवेक्षक' (Observer) के रूप में इसमें शामिल होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
भारत का प्रतिनिधित्व और रणनीति
गुरुवार (19 फरवरी) को वॉशिंगटन डीसी में आयोजित इस ऐतिहासिक बैठक में भारतीय दूतावास में तैनात चार्ज डी' अफेयर्स नामग्या सी खम्पा ने देश का प्रतिनिधित्व किया। भारत का यह कदम उसकी विदेश नीति की सूझबूझ को दर्शाता है, जिसके तहत वह किसी भी नए अंतरराष्ट्रीय मंच के उद्देश्यों और बारीकियों को समझे बिना उसमें शामिल होने में जल्दबाजी नहीं करना चाहता।
पिछले महीने दावोस में इस परियोजना की घोषणा के समय भारत इस कार्यक्रम से दूर रहा था। 12 फरवरी को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी स्पष्ट किया था कि अमेरिका का निमंत्रण मिला है और प्रस्ताव पर विचार चल रहा है। उन्होंने कहा था, "भारत ने पश्चिम एशिया में शांति को बढ़ावा देने वाले प्रयासों का हमेशा समर्थन किया है।"
ट्रंप का लक्ष्य: संयुक्त राष्ट्र को टक्कर
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने की ओर इशारा करता है। ट्रंप ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान दावा किया था कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) को टक्कर देने में सक्षम होगा। हालांकि, इसकी शुरुआत गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम की निगरानी और शासन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन अब इसका दायरा काफी व्यापक हो गया है।
बैठक का आयोजन और सदस्य
वॉशिंगटन स्थित 'यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस' में आयोजित इस बैठक में लगभग 50 देशों के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। इनमें 27 देशों ने पूर्ण सदस्यता स्वीकार की, जिनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, यूएई और वियतनाम शामिल हैं। वहीं, भारत और यूरोपीय संघ (EU) सहित कई अन्य देशों ने सावधानी बरतते हुए पर्यवेक्षक का दर्जा स्वीकार किया।
बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता
बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़ी वित्तीय सहायता की घोषणा की। ट्रंप ने बताया कि 9 सदस्य देशों- कजाकिस्तान, अजरबैजान, यूएई, मोरक्को, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, उज्बेकिस्तान और कुवैत ने गाजा के लिए राहत पैकेज के तहत कुल 7 अरब डॉलर देने पर सहमति व्यक्त की है। साथ ही, उन्होंने घोषणा की कि अमेरिका भी इस बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर का योगदान देगा, जो इस परियोजना की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।
विश्लेषण: भारत का सोचा-समझा कदम
भारत का पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होना एक स्पष्ट संदेश देता है कि वह अमेरिका के साथ संवाद और पश्चिम एशिया में शांति पहल में योगदान देने के इच्छुक है, लेकिन वह अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता को किसी भी नए संगठन की सदस्यता के नाम पर बाध्य नहीं करना चाहता। भारत की यह रणनीति उसके दीर्घकालिक हितों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी परिपक्व समझ को रेखांकित करती है। Board of Peace
Board of Peace : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी पहल 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) की पहली बैठक में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्रदर्शित करते हुए एक संतुलित रुख अपनाया है। भारत ने इस नए अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ का पूर्ण सदस्य बनने के निमंत्रण पर तत्काल स्वीकृति नहीं दी, बल्कि सावधानी बरतते हुए 'पर्यवेक्षक' (Observer) के रूप में इसमें शामिल होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
भारत का प्रतिनिधित्व और रणनीति
गुरुवार (19 फरवरी) को वॉशिंगटन डीसी में आयोजित इस ऐतिहासिक बैठक में भारतीय दूतावास में तैनात चार्ज डी' अफेयर्स नामग्या सी खम्पा ने देश का प्रतिनिधित्व किया। भारत का यह कदम उसकी विदेश नीति की सूझबूझ को दर्शाता है, जिसके तहत वह किसी भी नए अंतरराष्ट्रीय मंच के उद्देश्यों और बारीकियों को समझे बिना उसमें शामिल होने में जल्दबाजी नहीं करना चाहता।
पिछले महीने दावोस में इस परियोजना की घोषणा के समय भारत इस कार्यक्रम से दूर रहा था। 12 फरवरी को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी स्पष्ट किया था कि अमेरिका का निमंत्रण मिला है और प्रस्ताव पर विचार चल रहा है। उन्होंने कहा था, "भारत ने पश्चिम एशिया में शांति को बढ़ावा देने वाले प्रयासों का हमेशा समर्थन किया है।"
ट्रंप का लक्ष्य: संयुक्त राष्ट्र को टक्कर
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने की ओर इशारा करता है। ट्रंप ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान दावा किया था कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) को टक्कर देने में सक्षम होगा। हालांकि, इसकी शुरुआत गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम की निगरानी और शासन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन अब इसका दायरा काफी व्यापक हो गया है।
बैठक का आयोजन और सदस्य
वॉशिंगटन स्थित 'यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस' में आयोजित इस बैठक में लगभग 50 देशों के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। इनमें 27 देशों ने पूर्ण सदस्यता स्वीकार की, जिनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, यूएई और वियतनाम शामिल हैं। वहीं, भारत और यूरोपीय संघ (EU) सहित कई अन्य देशों ने सावधानी बरतते हुए पर्यवेक्षक का दर्जा स्वीकार किया।
बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता
बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़ी वित्तीय सहायता की घोषणा की। ट्रंप ने बताया कि 9 सदस्य देशों- कजाकिस्तान, अजरबैजान, यूएई, मोरक्को, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, उज्बेकिस्तान और कुवैत ने गाजा के लिए राहत पैकेज के तहत कुल 7 अरब डॉलर देने पर सहमति व्यक्त की है। साथ ही, उन्होंने घोषणा की कि अमेरिका भी इस बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर का योगदान देगा, जो इस परियोजना की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।
विश्लेषण: भारत का सोचा-समझा कदम
भारत का पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होना एक स्पष्ट संदेश देता है कि वह अमेरिका के साथ संवाद और पश्चिम एशिया में शांति पहल में योगदान देने के इच्छुक है, लेकिन वह अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता को किसी भी नए संगठन की सदस्यता के नाम पर बाध्य नहीं करना चाहता। भारत की यह रणनीति उसके दीर्घकालिक हितों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी परिपक्व समझ को रेखांकित करती है। Board of Peace












