ईरान को लेकर दुनिया भर की मीडिया में बहुत कुछ कहा जा रहा है। कई विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि ईरान में इस्लामिक शासन के अब गिनती के दिन ही बचे हैं। लेकिन ईरान एक ऐसा देश है जिस पर कोई भी राय बनाने से पहले हमें बेहद सावधानी बरतने की जरुरत है।

IRAN NEWS: ईरान एक बार फिर उथल पुथल के दौर से गुजर रहा है। सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन 15 दिनों से जारी है। अर्थव्यवस्था के बुरे हालात से उपजा अंसतोष अब सत्ता परिवर्तन की दिशा में मुड़ता दिख रहा है। ईरान को लेकर दुनिया भर की मीडिया में बहुत कुछ कहा जा रहा है। कई विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि ईरान में इस्लामिक शासन के अब गिनती के दिन ही बचे हैं। लेकिन ईरान एक ऐसा देश है जिस पर कोई भी राय बनाने से पहले हमें बेहद सावधानी बरतने की जरुरत है। हम उन पांच प्वाइंट पर चर्चा करेंगे जो ईरान को जानने-समझने के लिए जरुरी हैं:
ईरान में प्रेस और नागिरक अधिकारों पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। विरोध प्रदर्शन के चलते देश भर में इंटरनेट पर रोक लगा दी गई है। वैसे भी ईरान दुनियाभर में सबसे अधिक इंटरनेट सेंसरशिप वाला देश रहा है। ऐसे में ईरान की सही खबरें बाहर आना मुश्किल है। दूसरी तरफ है वेस्टर्न मीडिया जो मुख्य तौर पर ईरान का आलोचक रही है। उसकी जानकारी पर भरोसा करना बड़ी गलती हो सकती है। ईरान और अमेरिका की दुश्मनी जग जाहिर है। ईरान मिडिल ईस्ट में अमेरिका हितों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट रहा है। ईरान की जनता सड़कों पर उतरी तो यूएस प्रेसिडेंट तुरंत एक्टिव हुए और प्रदर्शनकारियों के पक्ष में बयान देने लगे। दूसरी तरफ ईरानी सुप्रीम लीडर ने कहा कि प्रदर्शनकारी यूएस प्रेसिडेंट को खुश करने में लगे हैं।
इन दो विरोधी नजरियों के बीच ईरान की वास्तविकता को समझना एक चुनौती है। इसके लिए हमें लगातार फैक्ट्स को क्रॉस चेक करना होगा और घटनाक्रम का निष्पक्ष आकलन करना पड़ेगा?
यह पहली बार नहीं है जब ईरान में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पिछले 2 दशकों में देश में कई बार विरोध की लहरे उठीं लेकिन ईरानी सरकार इनसे पार पाने में सफल रही है। इससे पहले सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन 2009 में देखे गए थे जिसे ग्रीन मूवमेंट का नाम दिया गया। राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप इस आंदोलन की वजह बने थे। हालांकि तेहरान इन पर काबू पाने में कामयाब रहा। 2022 का साल भी ईरान में उथल पुथल का साल बन कर आया जब महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। लेकिन काफी मशक्कत के बाद सरकार विरोध की आवाज दबाने में सफल रही। फिलहाल कहना मुश्किल है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो सकता है या नहीं क्योंकि सरकार ऐसे प्रोटेस्ट को नियंत्रित करने का अनुभव रखती है। एतिहासिक रिकॉर्ड भी यही कहता है।
ट्रंप प्रशासन ने 3 जनवरी को वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। चीन और रूस की तरफ से सिर्फ औपचारिक विरोध दर्ज किया गया लेकिन कोई गंभीर चुनौती पेश नहीं की गई। ईरान का सहयोगी रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा है इसलिए वह ईरान की मदद करने की स्थिति में नहीं है। चीन की नीति किसी भी देश में सीधे हस्तक्षेप की नहीं रही है ऐसे में बीजिंग ईरान में कोई बड़ी भूमिका निभाएगा इसकी संभावनाएं बेहद कम है। यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से साफ है कि वह ईरान को लेकर कड़ा फैसला कर सकते हैं। पिछले साल ही उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी। अमेरिका की तरफ से फिर से सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
ये सबसे बड़ा सवाल है जो इन विरोध प्रदर्शनों से खड़ा हुआ है। दरअसल प्रदर्शनों की शुरुआत से ही ऐसे वीडियो जमकर इंटरनेट पर वायरल हुए जिनमें लोग ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के समर्थन में नारेबाजी करते दिखे। ईरान में नागरिक और महिला अधिकारों पर पाबंदियां लगी है लेकिन जनता याद कर रही है शाह पहलवी को जिनके दमनकारी शासन ने 1979 की इस्लामिक क्रांति को जन्म दिया था। वहीं शाह के निर्वासित बेटे लगातार लोगों से विरोध में शामिल होने और सिटी सेंटर्स पर कब्जे का आह्वान कर रहे हैं। वह जल्द ही देश लौटने की घोषणा भी कर रहे हैं। उन्होंने ट्रंप से भी प्रदर्शनाकारियों की मदद करने की अपील की थी। कोई भी पूर्व पीएम मोहम्मद मोसद्दक का नाम नहीं ले रहा है। जिन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे नाराज होकर यूएस और यूके ने मिलकर एक साजिश के तहत उन्हें 1953 में सत्ता से हटा दिया था।
ईरान तेल, गैस और खनिज संसाधनों के मामले में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। यह तेल रिजर्व के मामले में तीसरे, गैस रिजर्व के बारे में दूसरे नंबर पर है। ईरान में खनन (माइनिंग) अभी भी विकास के चरण में है, फिर भी यह देश दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण खनिज उत्पादकों में से एक है। यह दुनिया के टॉप-15 मेजर मिनिरल रिच देशों में शामिल है, जहां 68 प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। अगर ईरान में इस्लामिक शासन का अंत होता तो और तेल और अन्य संसाधनों पर अमेरिका समर्थित सरकार का कब्जा होगा ऐसे में दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई और कीमतों को तय करने अमेरिका अहम भूमिका निभाएगा। वो पहले ही सबसे बड़े तेल रिजर्व वाले वेनेजुएला पर कब्जा कर चुका है। अगर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में लिया कड़ा एक्शन तो दुनिया में एक बड़ा तेल संकट खड़ा हो सकता है। ईरान को दुनिया के इस महत्वपूर्ण तेल रूट में एक अहम रणनीतिक बढ़त हासिल है। वह इसे ब्लॉक कर सकता है। यहां से दुनिया का 20 से 30 फीसदी तेल गुजरता है। अगर हालात काबू से बाहर होते देख ईरानी सरकार यह कदम उठा सकती है। IRAN NEWS