ईरान में आर्थिक संकट पर हालात बिगड़े, हिंसा में 6 की मौत

अधिकारियों के हवाले से कहा जा रहा है कि ये मौतें तीन ऐसे शहरों में हुईं जहां लुर समुदाय की आबादी अधिक है। राजधानी तेहरान में प्रदर्शन फिलहाल कुछ हद तक शांत दिखे, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में आंदोलन की तीव्रता बढ़ती जा रही है।

ईरान में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शन तेज
ईरान में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शन तेज
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar02 Jan 2026 10:22 AM
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Iran Protest :  ईरान में आर्थिक बदहाली, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब राजधानी तेहरान की सीमाओं से बाहर निकलकर कई प्रांतों और ग्रामीण इलाकों तक फैलते जा रहे हैं। गुरुवार को हालात उस वक्त और गंभीर हो गए जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 6 लोगों की मौत की खबर सामने आई। रिपोर्टों के मुताबिक एक मौत बुधवार को हुई, जबकि गुरुवार को 5 लोगों ने जान गंवाई। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि 2022 के बड़े आंदोलन के बाद मौजूदा प्रदर्शनों के दौरान यह पहली बार है जब मौतों की पुष्टि हुई है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कड़ा रुख अपना सकती है। अधिकारियों के हवाले से कहा जा रहा है कि ये मौतें तीन ऐसे शहरों में हुईं जहां लुर समुदाय की आबादी अधिक है। राजधानी तेहरान में प्रदर्शन फिलहाल कुछ हद तक शांत दिखे, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में आंदोलन की तीव्रता बढ़ती जा रही है।

2022 के बाद सबसे बड़ा उभार?

विश्लेषकों के मुताबिक यह 2022 के बाद ईरान में सबसे बड़े विरोध प्रदर्शनों में गिना जा रहा है। तब महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद देशभर में व्यापक आंदोलन हुआ था। मौजूदा प्रदर्शन अभी उतने व्यापक या उग्र नहीं बताए जा रहे, लेकिन इसका स्वर धीरे-धीरे सत्ता-विरोधी होता जा रहा है—और यही सरकार के लिए चिंता का संकेत माना जा रहा है।

लोरेस्तान के अजना में सबसे ज्यादा टकराव

सबसे अधिक हिंसा लोरेस्तान प्रांत के अजना शहर में देखने को मिली। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में सड़कों पर आगजनी, गोली चलने जैसी आवाजें और “शर्म करो” जैसे नारे सुनाई देने का दावा किया जा रहा है। अर्ध-सरकारी फार्स न्यूज एजेंसी ने अजना में तीन लोगों की मौत की बात कही है। दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि सरकारी मीडिया ने इन घटनाओं पर बेहद सीमित जानकारी साझा की। माना जा रहा है कि 2022 के आंदोलन की रिपोर्टिंग करने वाले कई पत्रकारों की गिरफ्तारी के बाद मीडिया में बढ़ी सावधानी और दबाव भी सूचना-प्रवाह कम होने की एक बड़ी वजह हो सकती है। Iran Protest

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New Year के मौके पर स्विट्जरलैंड में बड़ा धमाका, कई लोगों की मौत की आशंका

Switzerland blast: स्विट्ज़रलैंड से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। नए साल के पहले दिन स्विट्ज़रलैंड के लग्जरी अल्पाइन स्की रिसॉर्ट में भीषण धमाका हुआ। धमाके में कई लोगों के मारे जाने और घायल होने की आशंका जताई जा रही है।

स्विट्जरलैंड
नए साल में स्विट्जरलैंड में बड़ा धमाका
locationभारत
userअसमीना
calendar01 Jan 2026 12:28 PM
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नए साल के पहले दिन स्विट्जरलैंड के एक लग्जरी अल्पाइन स्की रिजॉर्ट में स्थित बार में भीषण धमाका होने की खबर है। इस हादसे में कई लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया है और राहत व बचाव कार्य जारी है।

स्विट्जरलैंड में बड़ा धमाका

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि धमाके के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन इस घटना में कई लोगों के हताहत होने की संभावना है। धमाके के तुरंत बाद रिजॉर्ट में भीषण आग लग गई जिससे अफरातफरी मच गई।

अचानक हुआ जोरदार धमाका

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लोग नए साल का जश्न मना रहे थे तभी अचानक जोरदार धमाका हुआ। धमाके के बाद लोग चीखते-चिल्लाते हुए बाहर की ओर भागते नजर आए। पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंच गई है। 

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नव वर्ष का असली इतिहास: 1 जनवरी की परंपरा कहां से आई?

मगर क्या आपने कभी सोचा है कि नववर्ष मनाने की यह परंपरा शुरू कैसे हुई और आखिर 1 जनवरी ही दुनिया के लिए नए साल की तारीख क्यों बन गई? हमें यह सब आज सामान्य लगता है, लेकिन इसके पीछे सत्ता, धर्म, राजनीति से जुड़े सदियों पुराने फैसलों की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है।

1 जनवरी ही नया साल क्यों बना
1 जनवरी ही नया साल क्यों बना?
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar01 Jan 2026 12:08 PM
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New Year 1 January History : नव वर्ष 2026 की शुरुआत हो चुकी है। नव वर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही दुनिया भर में जश्न की रौशनी फैल चुकी है। भारत से लेकर अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी तक हर जगह आतिशबाजियां, पार्टियां और शुभकामनाओं का सिलसिला जारी है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि नववर्ष मनाने की यह परंपरा शुरू कैसे हुई और आखिर 1 जनवरी ही दुनिया के लिए नए साल की तारीख क्यों बन गई? हमें यह सब आज सामान्य लगता है, लेकिन इसके पीछे सत्ता, धर्म, राजनीति से जुड़े सदियों पुराने फैसलों की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है।

जनवरी नहीं मार्च से शुरू होता था प्राचीन रोम का साल

आज जिस जनवरी को हम नए साल की शुरुआत मानते हैं, कभी वह रोमन कैलेंडर के वजूद में था ही नहीं। शुरुआती दौर में रोम का कैलेंडर सिर्फ 10 महीनों का माना जाता था और साल की पहली सुबह मार्च महीने से शुरू होती थी। इसके पीछे की वजह भी व्यावहारिक थी,मार्च का महीना खेती के काम और युद्ध अभियानों के लिए अनुकूल माना जाता था। फिर लगभग 713 ईसा पूर्व में रोमन राजा न्यूमा पोम्पिलियस ने समय-गणना को नया आकार देते हुए जनवरी और फरवरी को कैलेंडर में शामिल किया। जनवरी का नाम रोमन देवता जानूस (Janus) के नाम पर रखा गया, जिसे दो चेहरों वाला देवता माना जाता था। एक चेहरा अतीत की ओर और दूसरा भविष्य की ओर देखता है। यही प्रतीकवाद जनवरी को नई शुरुआत और पुराने साल के समापन का संदेश देने लगा और आगे चलकर यही सोच 1 जनवरी को New Year की तारीख बनाने की नींव बनी।

1 जनवरी को न्यू ईयर मानने की शुरुआत कैसे हुई?

शुरुआती दौर में रोम में नया साल मार्च से ही गिना जाता था, लेकिन समय के साथ सत्ता ने कैलेंडर की दिशा भी बदल दी। 153 ईसा पूर्व में रोमन सीनेट ने बड़ा निर्णय लेते हुए तय किया कि सरकारी कामकाज और शीर्ष शासकीय पदों की जिम्मेदारी अब 1 जनवरी से संभाली जाएगी। इसके पीछे वजहें पूरी तरह व्यावहारिक थीं युद्ध की तैयारियों, प्रशासनिक योजना और शासन व्यवस्था को एक तय शुरुआत की जरूरत थी। यही फैसला धीरे-धीरे जनता की आदत और परंपरा में भी उतरता गया। इसके बाद 46 ईसा पूर्व में सम्राट जूलियस सीज़र ने समय-गणना को नई शक्ल देते हुए जूलियन कैलेंडर लागू किया। इसी कैलेंडर में साल की अवधि तय हुई, लीप ईयर की व्यवस्था बनी और 1 जनवरी को आधिकारिक तौर पर New Year का दर्जा मिल गया। यहीं से 1 जनवरी को नया साल मनाने की परंपरा ने दुनिया के इतिहास में अपनी जगह पक्की कर ली।

कैसे 1 जनवरी बना ग्लोबल न्यू ईयर?

मध्यकाल के यूरोप में न्यू ईयर की तारीख हर जगह एक जैसी नहीं थी। कई देशों में नया साल कभी 25 मार्च को मनाया जाता, तो कहीं क्रिसमस के आसपास साल बदलने की परंपरा चल पड़ी। इसी दौर में चर्च ने 1 जनवरी को मनाए जाने वाले उत्सवों को पगान/मूर्तिपूजक परंपरा मानकर इसे अपनाने में हिचक दिखाई, इसलिए 1 जनवरी लंबे समय तक सर्वमान्य तारीख नहीं बन पाई। फिर इतिहास ने एक निर्णायक मोड़ लिया। 1582 में पोप ग्रेगरी XIII ने समय-गणना की खामियों को दुरुस्त करते हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किया। इसी कैलेंडर ने 1 जनवरी को आधिकारिक रूप से नए साल की शुरुआत का दर्जा दिया। इसके बाद यूरोप के देश धीरे-धीरे इसी व्यवस्था के साथ चलते गए और फिर यही कैलेंडर दुनिया के बड़े हिस्से का मानक बन गया। नतीजा यह हुआ कि 1 जनवरी आज वैश्विक स्तर पर New Year की पहचान बन चुकी है।

भारत में 1 जनवरी का न्यू ईयर कब से मनाया जाता है?

भारत में नववर्ष की परंपराएं हमेशा से विविध रही हैं विक्रम संवत, शक संवत, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, बैसाखी, पोहेला बोइशाख जैसी कई मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं। लेकिन आधुनिक शासन-प्रशासन में बदलाव ब्रिटिश काल में आया, जब भारत में सरकारी और कानूनी कामकाज के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाया गया। चूंकि सरकारी दस्तावेज, अदालतें, बजट, शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था इसी कैलेंडर पर चलने लगी, इसलिए भारत में भी 1 जनवरी को “इंग्लिश न्यू ईयर” के रूप में मनाने की परंपरा स्थापित हो गई। New Year 1 January History

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