मध्य पूर्व क्यों है दुनिया की राजनीति का केंद्र?

एशिया–यूरोप–अफ्रीका को जोड़ने वाली इस पट्टी पर ऐसे समुद्री गेट मौजूद हैं, जिन पर दुनिया की ऊर्जा और सप्लाई चेन की सांसें टिकी रहती हैं। इन्हीं जलमार्गों से तेल, गैस और कंटेनर कार्गो का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

Middle East ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम
Middle East: ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar08 Jan 2026 12:56 PM
bookmark

Middle East : दुनिया की सत्ता-राजनीति में अगर किसी एक भू-भाग की धड़कन सबसे तेज सुनाई देती है, तो वह मध्य पूर्व (Middle East) है। यह इलाका सिर्फ तेल की वजह से नहीं, बल्कि ऊर्जा के विशाल भंडार, तीन बड़े धर्मों के पवित्र केंद्र, और वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करने वाले अहम समुद्री रास्तों के कारण अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हॉट ज़ोन बना हुआ है। यहाँ हालात कब बदल जाएँ कहना मुश्किल है; और यही अनिश्चितता इसे सबसे प्रभावशाली बनाती है। हॉर्मुज से लेकर स्वेज तक किसी भी रुकावट या तनाव की खबर कुछ ही घंटों में दुनिया भर के बाजारों में कीमतें हिला देती है, सुरक्षा रणनीतियाँ बदल देती है और कूटनीति की नई बिसात बिछा देती है। इसलिए Middle East सिर्फ एक क्षेत्र नहीं आज की वैश्विक राजनीति का केंद्र-बिंदु है।

Middle East के जलमार्ग क्यों हैं निर्णायक?

मध्य पूर्व की असली रणनीतिक ताकत उसका भूगोल है यही वजह है कि यह इलाका दुनिया के लिए सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम बन जाता है। एशिया–यूरोप–अफ्रीका को जोड़ने वाली इस पट्टी पर ऐसे समुद्री गेट मौजूद हैं, जिन पर दुनिया की ऊर्जा और सप्लाई चेन की सांसें टिकी रहती हैं। इन्हीं जलमार्गों से तेल, गैस और कंटेनर कार्गो का बड़ा हिस्सा गुजरता है। जैसे ही यहाँ तनाव बढ़ता है, सबसे पहले जहाज़ों की आवाजाही धीमी पड़ती है और फिर असर तुरंत तेल की कीमतों, बीमा लागत, मालभाड़े और बाजार की घबराहट में दिखाई देता है। यही कारण है कि महाशक्तियाँ इस इलाके में सिर्फ दिलचस्पी नहीं रखतीं, बल्कि अपनी सैन्य और कूटनीतिक मौजूदगी के जरिए इन रास्तों पर नजर भी बनाए रखती हैं।

तेल की कीमतें और वैश्विक राजनीति

मध्य पूर्व को यूँ ही दुनिया की ऊर्जा राजधानी नहीं कहा जाता। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और UAE जैसे देश दशकों से तेल–गैस की वैश्विक सप्लाई के सबसे बड़े स्तंभ रहे हैं। यही वजह है कि यहाँ के हालात में ज़रा-सी हलचल भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तुरंत “सिग्नल” भेज देती है। तेल के दाम बढ़ें तो महंगाई का ग्राफ चढ़ता है, परिवहन महंगा होता है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और कई देशों की आर्थिक स्थिरता पर दबाव आ जाता है। दूसरे शब्दों में, मध्य पूर्व में तनाव सिर्फ़ क्षेत्रीय खबर नहीं रहता वह दुनिया भर के लोगों की जेब तक असर पहुंचाता है। इसी कारण अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप जैसी शक्तियाँ इस क्षेत्र की राजनीति पर लगातार नजर रखती हैं, क्योंकि यहाँ की अस्थिरता अक्सर पूरे विश्व के लिए ग्लोबल बिल बढ़ा देती है।

Middle East का धार्मिक आयाम

मध्य पूर्व सिर्फ ऊर्जा और भू-रणनीति का इलाका नहीं, बल्कि दुनिया की आस्था-राजनीति की धुरी भी है। यही वह भूमि है जहाँ इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म की ऐतिहासिक जड़ें मिलती हैं मक्का–मदीना, यरुशलम और बेथलहम जैसे शहर केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भावनाओं, पहचान और विचारधाराओं के सबसे संवेदनशील केंद्र हैं। जब इन पवित्र स्थलों और धार्मिक प्रतीकों की बात राजनीति से जुड़ती है, तो विवाद सिर्फ नक्शे की रेखाओं तक सीमित नहीं रहता वह इतिहास, पहचान और अस्तित्व के सवाल में बदल जाता है।

मध्य पूर्व की अस्थिरता

मध्य पूर्व की पहचान पिछले कई दशकों से एक ऐसे क्षेत्र के रूप में बनी है, जहाँ तनाव घटना’ नहीं लगातार चलने वाली स्थिति है। इजराइल–फिलिस्तीन विवाद, ईरान–अमेरिका टकराव, सीरिया और यमन की जंग, इराक व लीबिया की अस्थिरता ये सभी संघर्ष केवल सीमाओं के भीतर नहीं सुलगते, बल्कि उनकी चिंगारियाँ दूर-दूर तक फैलती हैं। नतीजा यह होता है कि शरणार्थियों की लहरें नई चुनौतियाँ पैदा करती हैं, आतंकवाद और कट्टरपंथ को जमीन मिलती है, मानवीय संकट गहराता है और साथ ही ऊर्जा आपूर्ति पर भी जोखिम बढ़ जाता है। यही वजह है कि मध्य पूर्व का हर घटनाक्रम दुनिया के लिए सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीति का अलार्म बन जाता है।

Middle East में कौन कितना मजबूत?

मध्य पूर्व आज महाशक्तियों की रणनीति का सबसे संवेदनशील मैदान बन चुका है, जहाँ हितों की रेखाएँ अक्सर सीधे टकराती दिखती हैं। अमेरिका के लिए यह इलाका ऊर्जा सुरक्षा, अहम समुद्री मार्गों पर निगरानी और इजराइल की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रूस यहाँ अपनी सैन्य मौजूदगी और कूटनीतिक पकड़ को मजबूत कर वैश्विक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। वहीं चीन इस क्षेत्र को व्यापार, निवेश और ऊर्जा आपूर्ति की लंबी अवधि वाली जरूरतों के लिहाज से देखता है। 

सुरक्षा नीति का भी केंद्र है Middle East

मध्य पूर्व को अक्सर दुनिया का हाई-सिक्योरिटी ज़ोन कहा जाता है और इसकी एक बड़ी वजह है यहाँ का हथियार बाजार और सैन्य मौजूदगी। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े रक्षा सौदों का केंद्र रहा है, जहाँ आधुनिक हथियारों की खरीद-बिक्री सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन का संकेत भी मानी जाती है। इसी के साथ कई देशों के सैन्य अड्डे, नौसैनिक बेड़े और वायुसेना बेस इस इलाके में तैनात हैं, जो इसे रणनीतिक रूप से और भी संवेदनशील बनाते हैं।  Middle East


संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

ट्रंप के ग्रीनलैंड बयान के बाद यूरोपीय देशों की एकजुटता

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप को तेल रिकवरी और शांति मिशन बताया और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ग्रीनलैंड पर दावा जताया। इस पर प्रतिक्रिया में फ्रांस, जर्मनी और पांच अन्य यूरोपीय देशों ने संयुक्त बयान जारी कर ट्रंप को संदेश दिया है।

US President Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar06 Jan 2026 08:28 PM
bookmark

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक टिप्पणी के बाद यूरोप के सात प्रमुख देश एकजुट हो गए हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।

यूरोपीय देशों का संयुक्त बयान

फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा यूरोप की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। बयान में स्पष्ट किया गया कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर फैसला केवल डेनमार्क और वहां के लोगों का अधिकार है।

इस संयुक्त बयान पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के हस्ताक्षर हैं।

आर्कटिक सुरक्षा पर यूरोप का रुख

संयुक्त बयान में कहा गया कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा न केवल यूरोप बल्कि अंतरराष्ट्रीय और ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा के लिए भी बेहद अहम है। नाटो पहले ही आर्कटिक को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल कर चुका है और यूरोपीय सहयोगी देश वहां अपनी सैन्य मौजूदगी और निवेश लगातार बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि*डेनमार्क साम्राज्य, जिसमें ग्रीनलैंड शामिल है, नाटो का हिस्सा है और इस क्षेत्र की सुरक्षा नाटो सहयोगियों, खासकर अमेरिका, के साथ मिलकर सुनिश्चित की जानी चाहिए। हालांकि, इसमें संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की अक्षुण्णता से कोई समझौता नहीं होगा।

अमेरिका अहम साझेदार, लेकिन फैसला स्वतंत्र

बयान में 1951 के रक्षा समझौते का हवाला देते हुए कहा गया कि अमेरिका आर्कटिक सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन ग्रीनलैंड से जुड़े फैसले किसी भी बाहरी दबाव में नहीं लिए जाएंगे।

ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता

दरअसल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था किे हमें ग्रीनलैंड चाहिए… वहां इस वक्त रूसी और चीनी जहाज मौजूद हैं। ट्रंप ने यह दावा भी किया कि यूरोपीय संघ चाहता है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में ले, क्योंकि यह अमेरिका की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए जरूरी है। उनके इस बयान के बाद यूरोप में गंभीर चिंता जताई गई।

संबंधित खबरें

अगली खबर पढ़ें

सऊदी अरब का The Line City कैसे बदलेगा शहरों का भविष्य?

The Line की सबसे बड़ी खासियत यह बताई जा रही है कि यहां सड़कें और निजी कारें शहर की जरूरत ही नहीं होंगी। आवाजाही के लिए अंडरग्राउंड हाई-स्पीड ट्रांसपोर्ट सिस्टम प्रस्तावित है, जिसके जरिए दावा किया जा रहा है कि शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक का सफर 20 मिनट से भी कम समय में पूरा किया जा सकेगा।

दुनिया भर की नजरें The Line City पर
दुनिया भर की नजरें The Line City पर
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar06 Jan 2026 10:32 AM
bookmark

Saudi Arabia : दुनिया के बड़े शहर आज भीड़, प्रदूषण और ट्रैफिक जाम की तिहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। इसी संकट के जवाब में सऊदी अरब एक ऐसी शहरी परिकल्पना को आकार दे रहा है, जो शहरों के रहने-बसने के तरीके पर ही नई बहस छेड़ देती है नाम है ‘द लाइन (The Line City)’। यह NEOM प्रोजेक्ट का सबसे चर्चित और महत्वाकांक्षी हिस्सा माना जा रहा है, जिसे सड़क-रहित, कार-मुक्त और धुआं-मुक्त शहर के तौर पर पेश किया जा रहा है। दावा है कि यहां रोजमर्रा की जरूरतें मिनटों में पूरी होंगी, प्रकृति का दखल कम से कम होगा और आधुनिक तकनीक के सहारे शहर जगह नहीं, व्यवस्था की तरह काम करेगा

The Line City क्या है?

सऊदी अरब का The Line पारंपरिक शहरों की तरह फैलने वाला नहीं, बल्कि सीधी रेखा में बसने वाला एक अनोखा अर्बन मॉडल है। प्रस्ताव के मुताबिक इसकी लंबाई करीब 170 किलोमीटर, चौड़ाई लगभग 200 मीटर और ऊंचाई करीब 500 मीटर तक रखी जाएगी। कॉन्सेप्ट यह है कि शहर दो विशाल ‘मिरर’ जैसी इमारतों के बीच आकार लेगा जिससे बाहर से इसका लुक एक चमकते, भविष्यवादी कांच-धातु वाले मेगा-स्ट्रक्चर जैसा दिखाई देगा। इस महत्वाकांक्षी योजना का ऐलान 2021 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने किया था। The Line की सबसे बड़ी खासियत यह बताई जा रही है कि यहां सड़कें और निजी कारें शहर की जरूरत ही नहीं होंगी। आवाजाही के लिए अंडरग्राउंड हाई-स्पीड ट्रांसपोर्ट सिस्टम प्रस्तावित है, जिसके जरिए दावा किया जा रहा है कि शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक का सफर 20 मिनट से भी कम समय में पूरा किया जा सकेगा।

घर से 5 मिनट में ‘पूरी दुनिया’

The Line की योजना का एक बड़ा दावा यह है कि यहां “दूरी” नहीं, नजदीकी शहर की पहचान होगी। इस शहर को इस तरह डिजाइन करने का दावा किया गया है कि रोजमर्रा की हर जरूरत घर से सिर्फ 5 मिनट की पैदल दूरी पर उपलब्ध होगी। स्कूल और अस्पताल से लेकर शॉपिंग व सर्विस सेंटर, ऑफिस स्पेस और पार्क–ओपन एरिया तक, सब कुछ आसपास ही मिलेगा। 

ग्रीन सिटी का दावा

The Line को कार्बन-फ्री शहर की दिशा में सऊदी अरब का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है। प्रस्तावित मॉडल के तहत शहर की ऊर्जा जरूरतें फॉसिल फ्यूल पर नहीं, बल्कि रिन्यूएबल एनर्जी पर टिकेंगी जिसमें सोलर पावर, विंड एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन को प्रमुख आधार बताया गया है। सऊदी अरब का तर्क है कि इस ढांचे से न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती होगी, बल्कि यह दुनिया को प्रदूषण-मुक्त शहरी जीवन का एक नया और व्यावहारिक रोडमैप भी दिखा सकता है।

AI से चलेगा शहर

The Line को सऊदी अरब सिर्फ एक स्मार्ट सिटी नहीं, बल्कि AI-ड्रिवन सिटी के रूप में पेश कर रहा है—जहां शहर को चलाने का काम सिस्टम करेगा, इंसान नहीं। प्रस्तावित ढांचे में AI आधारित मैनेजमेंट, स्मार्ट डेटा नेटवर्क, ऑटोमेटेड सर्विसेज और रोबोटिक मेंटेनेंस जैसी तकनीकों को शहर की रीढ़ बताया गया है।

कैसी होगी लाइफस्टाइल?

The Line को सऊदी अरब एक ऐसे शहर के तौर पर गढ़ रहा है, जहां करीब 90 लाख लोगों के बसने की योजना बताई जा रही है। दावा है कि इस नई बसावट में नागरिकों को बेहतर हेल्थकेयर, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और शांत, साफ व धुआं-रहित माहौल मिलेगा। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इसे 15 मिनट सिटी से भी आगे का मॉडल मानते हैं,जहां जिंदगी की रफ्तार ट्रैफिक से नहीं, बल्कि पास मौजूद सुविधाओं से तय होगी। साथ ही सऊदी अरब इस प्रोजेक्ट को आर्थिक बदलाव के बड़े इंजन के रूप में भी देख रहा है। उम्मीद है कि कंस्ट्रक्शन, आईटी/टेक्नोलॉजी, हेल्थ-एजुकेशन और टूरिज्म-सर्विस सेक्टर में बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होंगी। विदेशी निवेशकों के लिए भी यह परियोजना ‘फ्यूचर सिटी’ की हाई-प्रोफाइल पेशकश मानी जा रही है—जहां तकनीक, पूंजी और नए बाजार एक साथ जुड़ते दिखते हैं।

विवाद भी कम नहीं

The Line जितना दूरदर्शी और आकर्षक कॉन्सेप्ट है, उतनी ही तेज़ इसकी आलोचनाओं की धार भी रही है। सवाल उठते हैं कि क्या इस मेगा प्रोजेक्ट की कुल लागत अनुमान से कई गुना बढ़ सकती है? क्या निर्माण का दबाव स्थानीय पर्यावरण और इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाएगा? और सबसे अहम क्या 170 किलोमीटर लंबी ‘लाइन’ में शहर बसाने की योजना व्यावहारिक रूप से उतनी आसान है, जितनी प्रेज़ेंटेशन में दिखाई जाती है? हालांकि सऊदी सरकार का दावा है कि अत्याधुनिक इंजीनियरिंग, नई तकनीक और डेटा-आधारित प्लानिंग के जरिए इन चुनौतियों को मैनेज किया जा सकता है। Saudi Arabia

संबंधित खबरें