तेहरान में रातभर बवाल, 217 लोगों की मौत के बाद पूरे ईरान में इंटरनेट बंद

Iran News: ईरान की राजधानी तेहरान में हालात बेहद तनावपूर्ण हो चुके हैं जहां महंगाई से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब सत्ता और धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ हिंसक आंदोलन में बदल गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी है।

तेहरान
ईरान के तेहरान में रातभर बवाल
locationभारत
userअसमीना
calendar10 Jan 2026 11:10 AM
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ईरान की राजधानी तेहरान इस समय गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रही है। बीते दो हफ्तों से चल रहा विरोध प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुका है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, केवल तेहरान में अब तक 217 लोगों की जान जा चुकी है जबकि 2,000 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। ईरानी सरकार ने हालात बेकाबू होते देख पूरे देश में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं।

महंगाई और बेरोजगारी से भड़का गुस्सा

इस आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बेरोजगारी और ईरानी रियाल की गिरती कीमत के विरोध से हुई थी। आम लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे सरकार और धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत में बदल गया। शुरुआती दौर में प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे लेकिन हाल के दिनों में हालात बेहद हिंसक हो गए हैं।

तेहरान में सबसे ज्यादा हिंसा

तेहरान के एक डॉक्टर ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर टाइम मैगजीन को बताया कि राजधानी के केवल 6 अस्पतालों में 217 प्रदर्शनकारियों की मौत दर्ज की गई है। इनमें से अधिकांश की मौत गोली लगने से हुई है। इसके अलावा, झड़पों में 14 सेना के जवानों की भी जान गई है।

देशभर में फैल चुका है आंदोलन

यह विरोध प्रदर्शन अब केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहा। मशहद, कोम, इस्फ़हान, मशिरियेह, कज़विन, बुशहर और वज्द जैसे कई बड़े शहरों में भी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने कई इलाकों में सड़कों पर आगजनी, तोड़फोड़ और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है।

14 दिनों में 5 लाख लोग सड़कों पर

सरकारी और स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 14 दिनों में 5 लाख से ज्यादा लोग इस आंदोलन में शामिल हो चुके हैं। देशभर में करीब 400 जगहों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस अब तक 2,300 लोगों को हिरासत में ले चुकी है लेकिन हालात अभी भी नियंत्रण से बाहर हैं।

मस्जिदें, बैंक और सरकारी इमारतें बनीं निशाना

हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर सरकारी और धार्मिक संस्थानों को नुकसान पहुंचाया है। बताया जा रहा है कि, अब तक 25 मस्जिदों में आग लगाई गई, 26 बैंकों में लूट की गई, 10 सरकारी इमारतें जलकर खाक हो गईं, 48 फायर ट्रक और 42 बसें जला दी गईं, 24 अपार्टमेंट को भारी नुकसान पहुंचा। इसके अलावा, बासिज और IRGC कैंप पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं।

तेहरान के मेयर का बयान

तेहरान के मेयर अलीरेज़ा ज़कानी ने सरकारी टीवी पर कहा कि दंगों से राजधानी के इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने बताया कि “एक अस्पताल, दो मेडिकल सेंटर, 26 बैंक, 25 मस्जिदें और कई कानून लागू करने वाली चौकियों को नुकसान पहुंचा है। इमरजेंसी टीमें हालात संभालने में लगी हैं।”

इंटरनेट बंद, कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद

सरकार ने अफवाहों और समन्वय को रोकने के लिए पूरे ईरान में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। इसके साथ ही कई इलाकों में कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी बंद कर दिए गए हैं। बता दें कि, 29 दिसंबर 2025 को तेहरान में व्यापारियों ने ईरानी रियाल की गिरती कीमत के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया। अगले दिन इसमें तेहरान यूनिवर्सिटी के छात्र भी शामिल हो गए। 2 जनवरी को इलम प्रांत में हथियारबंद नकाबपोश लोगों की मौजूदगी की खबरें आईं जिसके बाद हालात तेजी से बिगड़ते चले गए।

ईरान के लिए अब तक का सबसे बड़ा संकट

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंदोलन अब केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि ईरान की सत्ता व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। हालात कब और कैसे संभलेंगे इस पर अभी कोई स्पष्ट संकेत नहीं है।

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मध्य पूर्व क्यों है दुनिया की राजनीति का केंद्र?

एशिया–यूरोप–अफ्रीका को जोड़ने वाली इस पट्टी पर ऐसे समुद्री गेट मौजूद हैं, जिन पर दुनिया की ऊर्जा और सप्लाई चेन की सांसें टिकी रहती हैं। इन्हीं जलमार्गों से तेल, गैस और कंटेनर कार्गो का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

Middle East ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम
Middle East: ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar08 Jan 2026 12:56 PM
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Middle East : दुनिया की सत्ता-राजनीति में अगर किसी एक भू-भाग की धड़कन सबसे तेज सुनाई देती है, तो वह मध्य पूर्व (Middle East) है। यह इलाका सिर्फ तेल की वजह से नहीं, बल्कि ऊर्जा के विशाल भंडार, तीन बड़े धर्मों के पवित्र केंद्र, और वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करने वाले अहम समुद्री रास्तों के कारण अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हॉट ज़ोन बना हुआ है। यहाँ हालात कब बदल जाएँ कहना मुश्किल है; और यही अनिश्चितता इसे सबसे प्रभावशाली बनाती है। हॉर्मुज से लेकर स्वेज तक किसी भी रुकावट या तनाव की खबर कुछ ही घंटों में दुनिया भर के बाजारों में कीमतें हिला देती है, सुरक्षा रणनीतियाँ बदल देती है और कूटनीति की नई बिसात बिछा देती है। इसलिए Middle East सिर्फ एक क्षेत्र नहीं आज की वैश्विक राजनीति का केंद्र-बिंदु है।

Middle East के जलमार्ग क्यों हैं निर्णायक?

मध्य पूर्व की असली रणनीतिक ताकत उसका भूगोल है यही वजह है कि यह इलाका दुनिया के लिए सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि ग्लोबल ट्रेड का कंट्रोल रूम बन जाता है। एशिया–यूरोप–अफ्रीका को जोड़ने वाली इस पट्टी पर ऐसे समुद्री गेट मौजूद हैं, जिन पर दुनिया की ऊर्जा और सप्लाई चेन की सांसें टिकी रहती हैं। इन्हीं जलमार्गों से तेल, गैस और कंटेनर कार्गो का बड़ा हिस्सा गुजरता है। जैसे ही यहाँ तनाव बढ़ता है, सबसे पहले जहाज़ों की आवाजाही धीमी पड़ती है और फिर असर तुरंत तेल की कीमतों, बीमा लागत, मालभाड़े और बाजार की घबराहट में दिखाई देता है। यही कारण है कि महाशक्तियाँ इस इलाके में सिर्फ दिलचस्पी नहीं रखतीं, बल्कि अपनी सैन्य और कूटनीतिक मौजूदगी के जरिए इन रास्तों पर नजर भी बनाए रखती हैं।

तेल की कीमतें और वैश्विक राजनीति

मध्य पूर्व को यूँ ही दुनिया की ऊर्जा राजधानी नहीं कहा जाता। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और UAE जैसे देश दशकों से तेल–गैस की वैश्विक सप्लाई के सबसे बड़े स्तंभ रहे हैं। यही वजह है कि यहाँ के हालात में ज़रा-सी हलचल भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तुरंत “सिग्नल” भेज देती है। तेल के दाम बढ़ें तो महंगाई का ग्राफ चढ़ता है, परिवहन महंगा होता है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और कई देशों की आर्थिक स्थिरता पर दबाव आ जाता है। दूसरे शब्दों में, मध्य पूर्व में तनाव सिर्फ़ क्षेत्रीय खबर नहीं रहता वह दुनिया भर के लोगों की जेब तक असर पहुंचाता है। इसी कारण अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप जैसी शक्तियाँ इस क्षेत्र की राजनीति पर लगातार नजर रखती हैं, क्योंकि यहाँ की अस्थिरता अक्सर पूरे विश्व के लिए ग्लोबल बिल बढ़ा देती है।

Middle East का धार्मिक आयाम

मध्य पूर्व सिर्फ ऊर्जा और भू-रणनीति का इलाका नहीं, बल्कि दुनिया की आस्था-राजनीति की धुरी भी है। यही वह भूमि है जहाँ इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म की ऐतिहासिक जड़ें मिलती हैं मक्का–मदीना, यरुशलम और बेथलहम जैसे शहर केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भावनाओं, पहचान और विचारधाराओं के सबसे संवेदनशील केंद्र हैं। जब इन पवित्र स्थलों और धार्मिक प्रतीकों की बात राजनीति से जुड़ती है, तो विवाद सिर्फ नक्शे की रेखाओं तक सीमित नहीं रहता वह इतिहास, पहचान और अस्तित्व के सवाल में बदल जाता है।

मध्य पूर्व की अस्थिरता

मध्य पूर्व की पहचान पिछले कई दशकों से एक ऐसे क्षेत्र के रूप में बनी है, जहाँ तनाव घटना’ नहीं लगातार चलने वाली स्थिति है। इजराइल–फिलिस्तीन विवाद, ईरान–अमेरिका टकराव, सीरिया और यमन की जंग, इराक व लीबिया की अस्थिरता ये सभी संघर्ष केवल सीमाओं के भीतर नहीं सुलगते, बल्कि उनकी चिंगारियाँ दूर-दूर तक फैलती हैं। नतीजा यह होता है कि शरणार्थियों की लहरें नई चुनौतियाँ पैदा करती हैं, आतंकवाद और कट्टरपंथ को जमीन मिलती है, मानवीय संकट गहराता है और साथ ही ऊर्जा आपूर्ति पर भी जोखिम बढ़ जाता है। यही वजह है कि मध्य पूर्व का हर घटनाक्रम दुनिया के लिए सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीति का अलार्म बन जाता है।

Middle East में कौन कितना मजबूत?

मध्य पूर्व आज महाशक्तियों की रणनीति का सबसे संवेदनशील मैदान बन चुका है, जहाँ हितों की रेखाएँ अक्सर सीधे टकराती दिखती हैं। अमेरिका के लिए यह इलाका ऊर्जा सुरक्षा, अहम समुद्री मार्गों पर निगरानी और इजराइल की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रूस यहाँ अपनी सैन्य मौजूदगी और कूटनीतिक पकड़ को मजबूत कर वैश्विक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। वहीं चीन इस क्षेत्र को व्यापार, निवेश और ऊर्जा आपूर्ति की लंबी अवधि वाली जरूरतों के लिहाज से देखता है। 

सुरक्षा नीति का भी केंद्र है Middle East

मध्य पूर्व को अक्सर दुनिया का हाई-सिक्योरिटी ज़ोन कहा जाता है और इसकी एक बड़ी वजह है यहाँ का हथियार बाजार और सैन्य मौजूदगी। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े रक्षा सौदों का केंद्र रहा है, जहाँ आधुनिक हथियारों की खरीद-बिक्री सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन का संकेत भी मानी जाती है। इसी के साथ कई देशों के सैन्य अड्डे, नौसैनिक बेड़े और वायुसेना बेस इस इलाके में तैनात हैं, जो इसे रणनीतिक रूप से और भी संवेदनशील बनाते हैं।  Middle East


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ट्रंप के ग्रीनलैंड बयान के बाद यूरोपीय देशों की एकजुटता

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप को तेल रिकवरी और शांति मिशन बताया और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ग्रीनलैंड पर दावा जताया। इस पर प्रतिक्रिया में फ्रांस, जर्मनी और पांच अन्य यूरोपीय देशों ने संयुक्त बयान जारी कर ट्रंप को संदेश दिया है।

US President Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar06 Jan 2026 08:28 PM
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक टिप्पणी के बाद यूरोप के सात प्रमुख देश एकजुट हो गए हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।

यूरोपीय देशों का संयुक्त बयान

फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा यूरोप की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। बयान में स्पष्ट किया गया कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर फैसला केवल डेनमार्क और वहां के लोगों का अधिकार है।

इस संयुक्त बयान पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के हस्ताक्षर हैं।

आर्कटिक सुरक्षा पर यूरोप का रुख

संयुक्त बयान में कहा गया कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा न केवल यूरोप बल्कि अंतरराष्ट्रीय और ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा के लिए भी बेहद अहम है। नाटो पहले ही आर्कटिक को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल कर चुका है और यूरोपीय सहयोगी देश वहां अपनी सैन्य मौजूदगी और निवेश लगातार बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि*डेनमार्क साम्राज्य, जिसमें ग्रीनलैंड शामिल है, नाटो का हिस्सा है और इस क्षेत्र की सुरक्षा नाटो सहयोगियों, खासकर अमेरिका, के साथ मिलकर सुनिश्चित की जानी चाहिए। हालांकि, इसमें संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की अक्षुण्णता से कोई समझौता नहीं होगा।

अमेरिका अहम साझेदार, लेकिन फैसला स्वतंत्र

बयान में 1951 के रक्षा समझौते का हवाला देते हुए कहा गया कि अमेरिका आर्कटिक सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन ग्रीनलैंड से जुड़े फैसले किसी भी बाहरी दबाव में नहीं लिए जाएंगे।

ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता

दरअसल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था किे हमें ग्रीनलैंड चाहिए… वहां इस वक्त रूसी और चीनी जहाज मौजूद हैं। ट्रंप ने यह दावा भी किया कि यूरोपीय संघ चाहता है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में ले, क्योंकि यह अमेरिका की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए जरूरी है। उनके इस बयान के बाद यूरोप में गंभीर चिंता जताई गई।

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