खेती से बंपर कमाई: लाखों का मुनाफा देती हैं टिंडा की ये उन्नत किस्में
टिंडे की खेती साल में दो बार की जा सकती है। पहली बुवाई फरवरी से मार्च तक, जबकि दूसरी बुवाई जून से जुलाई तक की जाती है। किसान टिंडा की उन्नत किस्मों की बुवाई करके अच्छी कमाई कर सकते हैं। ऐसे में तरीके अपनाएं जाए तो इसकी खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।

Tinda Cultivation : देश के किसानों के लिए अभी टिंडा सब्जी की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय चल रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उन्नत किस्मों की बुवाई और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान इस फसल से खूब मुनाफा कमा सकते हैं। टिंडे की खेती न केवल कम लागत में होती है, बल्कि इसकी मांग बाजार में हमेशा बनी रहती है।
आइए जानते हैं टिंडे की आधुनिक खेती का पूरा तरीका।
जलवायु और उपयुक्त मिट्टी
टिंडे की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे अनुकूल मानी जाती है। ठंडी जलवायु और पाला इस फसल के लिए हानिकारक हो सकते हैं, इसलिए इसे गर्मियों और बारिश के मौसम में उगाया जाता है। मिट्टी की बात करें तो जीवांशयुक्त, अच्छी जल निकासी वाली हल्की दोमट भूमि इसकी पैदावार के लिए सर्वोत्तम होती है, हालांकि यह हर तरह की मिट्टी में उग जाता है।
बुवाई का सही समय और उन्नत किस्में
विशेषज्ञों के मुताबिक, टिंडे की खेती साल में दो बार की जा सकती है। पहली बुवाई फरवरी से मार्च तक, जबकि दूसरी बुवाई जून से जुलाई तक की जाती है। अधिक उपज के लिए किसानों को उन्नत किस्मों को चुनना चाहिए। टिंडा एस 48, टिंडा लुधियाना, पंजाब टिंडा-1, अर्का टिंडा, अन्नामलाई टिंडा, मायको टिंडा, स्वाती, बीकानेरी ग्रीन और एस 22 जैसी किस्में बेहतर पैदावार देती हैं। ये फसल आमतौर पर दो महीने में तैयार हो जाती है।
खेत की तैयारी और बीज उपचार
बुवाई के लिए खेत की ट्रैक्टर और कल्टीवेटर से गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। एक एकड़ में 8-10 टन सड़ा हुआ गोबर का उपयोग करना चाहिए। बीज दर के तौर पर एक बीघा में डेढ़ किलो बीज पर्याप्त माना जाता है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार जरूरी है। बीजों को 12-24 घंटे पानी में भिगोने के बाद फंगस से बचाव के लिए कार्बेनडाजिम (2 ग्राम) या थीरम (2.5 ग्राम) प्रति किलो की दर से इलाज करें। इसके बाद ट्राइकोडरमा विराइड (4 ग्राम/किग्रा) का उपयोग कर छाया में सुखाकर बोना चाहिए।
खाद और सिंचाई प्रबंधन
एक एकड़ के लिए 90 किलो यूरिया, 125 किलो सिंगल सुपर फासफेट और 35 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश की सिफारिश की गई है। पूरी फासफोरस और पोटाश तथा एक-तिहाई नाइट्रोजन बुवाई के समय दें, बाकी बचा नाइट्रोजन फसल के शुरुआती दौर में दें। गर्मियों में इसे हफ्तेवार सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि बारिश के मौसम में वर्षा पर निर्भर करना पड़ता है।
तुड़ाई और आमदनी
बुवाई के 40-50 दिन बाद फलों की तुड़ाई शुरू की जा सकती है। जब फल मध्यम आकार के और पके हों, तो उन्हें तोड़ना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर एक हेक्टेयर में 100 से 125 क्विंटल तक उपज मिल सकती है। बाजार भाव के रूप में टिंडा सामान्यतः 20 से 40 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जिससे किसानों को बंपर मुनाफा हो सकता है। Tinda Cultivation
Tinda Cultivation : देश के किसानों के लिए अभी टिंडा सब्जी की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय चल रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उन्नत किस्मों की बुवाई और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान इस फसल से खूब मुनाफा कमा सकते हैं। टिंडे की खेती न केवल कम लागत में होती है, बल्कि इसकी मांग बाजार में हमेशा बनी रहती है।
आइए जानते हैं टिंडे की आधुनिक खेती का पूरा तरीका।
जलवायु और उपयुक्त मिट्टी
टिंडे की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे अनुकूल मानी जाती है। ठंडी जलवायु और पाला इस फसल के लिए हानिकारक हो सकते हैं, इसलिए इसे गर्मियों और बारिश के मौसम में उगाया जाता है। मिट्टी की बात करें तो जीवांशयुक्त, अच्छी जल निकासी वाली हल्की दोमट भूमि इसकी पैदावार के लिए सर्वोत्तम होती है, हालांकि यह हर तरह की मिट्टी में उग जाता है।
बुवाई का सही समय और उन्नत किस्में
विशेषज्ञों के मुताबिक, टिंडे की खेती साल में दो बार की जा सकती है। पहली बुवाई फरवरी से मार्च तक, जबकि दूसरी बुवाई जून से जुलाई तक की जाती है। अधिक उपज के लिए किसानों को उन्नत किस्मों को चुनना चाहिए। टिंडा एस 48, टिंडा लुधियाना, पंजाब टिंडा-1, अर्का टिंडा, अन्नामलाई टिंडा, मायको टिंडा, स्वाती, बीकानेरी ग्रीन और एस 22 जैसी किस्में बेहतर पैदावार देती हैं। ये फसल आमतौर पर दो महीने में तैयार हो जाती है।
खेत की तैयारी और बीज उपचार
बुवाई के लिए खेत की ट्रैक्टर और कल्टीवेटर से गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। एक एकड़ में 8-10 टन सड़ा हुआ गोबर का उपयोग करना चाहिए। बीज दर के तौर पर एक बीघा में डेढ़ किलो बीज पर्याप्त माना जाता है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार जरूरी है। बीजों को 12-24 घंटे पानी में भिगोने के बाद फंगस से बचाव के लिए कार्बेनडाजिम (2 ग्राम) या थीरम (2.5 ग्राम) प्रति किलो की दर से इलाज करें। इसके बाद ट्राइकोडरमा विराइड (4 ग्राम/किग्रा) का उपयोग कर छाया में सुखाकर बोना चाहिए।
खाद और सिंचाई प्रबंधन
एक एकड़ के लिए 90 किलो यूरिया, 125 किलो सिंगल सुपर फासफेट और 35 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश की सिफारिश की गई है। पूरी फासफोरस और पोटाश तथा एक-तिहाई नाइट्रोजन बुवाई के समय दें, बाकी बचा नाइट्रोजन फसल के शुरुआती दौर में दें। गर्मियों में इसे हफ्तेवार सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि बारिश के मौसम में वर्षा पर निर्भर करना पड़ता है।
तुड़ाई और आमदनी
बुवाई के 40-50 दिन बाद फलों की तुड़ाई शुरू की जा सकती है। जब फल मध्यम आकार के और पके हों, तो उन्हें तोड़ना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर एक हेक्टेयर में 100 से 125 क्विंटल तक उपज मिल सकती है। बाजार भाव के रूप में टिंडा सामान्यतः 20 से 40 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जिससे किसानों को बंपर मुनाफा हो सकता है। Tinda Cultivation












