बड़ी राहत : ईपीएफ सैलरी लिमिट बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि जब देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है और कई राज्यों में न्यूनतम वेतन 15,000 से ऊपर पहुंच चुका है, तो ईपीएफ की सैलरी सीमा पिछले 11 वर्षों से क्यों नहीं बदली गई। कोर्ट ने इसे मौजूदा हालात से मेल न खाने वाला नियम बताया।

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ईपीएफओ
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar07 Jan 2026 06:49 PM
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EPF Salary : निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक अहम अपडेट सामने आया है। कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) से जुड़ी सैलरी सीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि सरकार को अगले चार महीनों के भीतर यह तय करना होगा कि ईपीएफ की मौजूदा वेज लिमिट 15,000 से बढ़ाई जाए या नहीं।

महंगाई बढ़ी, लेकिन नियम वहीं के वहीं

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि जब देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है और कई राज्यों में न्यूनतम वेतन 15,000 से ऊपर पहुंच चुका है, तो ईपीएफ की सैलरी सीमा पिछले 11 वर्षों से क्यों नहीं बदली गई। कोर्ट ने इसे मौजूदा हालात से मेल न खाने वाला नियम बताया।

2014 के बाद नहीं हुआ कोई संशोधन

ईपीएफ की वेज सीलिंग में आखिरी बार बदलाव वर्ष 2014 में किया गया था, जब इसे 6,500 से बढ़ाकर 15,000 किया गया। इसके बाद समय बदला, वेतन बढ़े, जीवन-यापन महंगा हुआ, लेकिन ईपीएफ के नियम पुराने ही बने रहे। अदालत ने इसे गंभीर चूक मानते हुए सरकार से जवाब मांगा है।

न्यूनतम वेतन से भी कम हो गई ईपीएफ सीमा

आज स्थिति यह है कि कई सेक्टरों और राज्यों में सरकारी न्यूनतम वेतन ही 15,000 से अधिक है। ऐसे में कर्मचारी ईपीएफ की अनिवार्य सीमा से बाहर हो जाते हैं। कोर्ट के अनुसार, ईपीएफ का उद्देश्य कर्मचारियों को रिटायरमेंट, पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा देना है, लेकिन मौजूदा सीमा अब इस उद्देश्य में बाधा बन रही है।

पहले भी हो चुकी है सिफारिश

सरकार के भीतर इस मुद्दे पर पहले ही चर्चा हो चुकी है। वर्ष 2022 में ईपीएफ की एक सब-कमेटी ने सैलरी लिमिट बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। इसके अलावा सेंट्रल बोर्ड आॅफ ट्रस्टीज ने भी इस सिफारिश को स्वीकृति दी थी। बावजूद इसके, प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर सरकार को एक विस्तृत प्रस्तुति सौंपे, जिसके बाद केंद्र को निर्धारित समयसीमा में अंतिम फैसला लेना होगा।

कितनी बढ़ सकती है नई सीमा?

सूत्रों के मुताबिक, सरकार ईपीएफ की वेज लिमिट को बढ़ाकर 21,000 या 25,000 तक ले जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा फायदा कर्मचारियों की पेंशन और भविष्य निधि पर पड़ेगा। फिलहाल कर्मचारी पेंशन योजना में योगदान 15,000 की सीमा के आधार पर होता है। अगर यह सीमा 25,000 कर दी जाती है, तो मासिक पेंशन योगदान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। इससे कर्मचारियों के पेंशन फंड में सालाना हजारों रुपये अतिरिक्त जमा होंगे और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन भी बेहतर होगी।

नियोक्ताओं पर बढ़ेगा खर्च

हालांकि इस बदलाव का एक दूसरा पक्ष भी है। कर्मचारी पेंशन योजना में योगदान नियोक्ता द्वारा किया जाता है। सैलरी सीमा बढ़ने से कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, जिस वजह से कुछ नियोक्ता इसका विरोध कर सकते हैं। सरकार इस प्रस्ताव को ईपीएफ 3.0 विजन से जोड़कर देख रही है, जिसका लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है। यदि यह फैसला लागू होता है, तो निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।

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जाने, रबर इंडस्ट्री का काला सच, जो इतिहास में दबा

आज जब दुनिया तेज़ी से औद्योगिक विकास की ओर बढ़ रही है, रबर की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसका इतिहास हमें याद दिलाता है कि तकनीकी प्रगति की कीमत अक्सर इंसानी जानों और प्रकृति की तबाही के रूप में चुकानी पड़ी है।

The story of rubber
कांगो में रबर (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar07 Jan 2026 04:43 PM
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रबर, आज की आधुनिक दुनिया की सबसे ज़रूरी सामग्रियों में से एक है। कारों और हवाई जहाज़ों के टायर हों, फैक्ट्रियों की मशीनें हों या फिर रोज़मर्रा के उपयोग की चीज़ें—रबर के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना अधूरी है। लेकिन इस उपयोगी पदार्थ का इतिहास जितना रोचक है, उतना ही भयावह और रक्तरंजित भी है।

दक्षिण अमेरिका से शुरू हुई कहानी

बता दें कि रबर की खोज का श्रेय अक्सर अमेरिकी आविष्कारक चार्ल्स गुडइयर को दिया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि रबर का इस्तेमाल उनसे सैकड़ों साल पहले दक्षिण अमेरिका के मूल निवासी कर रहे थे। 1490 के आसपास अमेज़न क्षेत्र में रहने वाले लोग हेविया ब्रासीलिएंसिस नामक पेड़ से निकलने वाले गाढ़े तरल का उपयोग करते थे। इस पेड़ को चीरा लगाने पर दूध जैसा पदार्थ निकलता था, जिससे वे गेंदें और अन्य वस्तुएँ बनाते थे। फ्रांसीसी यात्रियों ने इन पेड़ों को स्थानीय भाषा में ‘काउचोउक’ कहते सुना, जिसका अर्थ था “रोने वाला पेड़”। यहीं से रबर की वैश्विक यात्रा शुरू हुई।

चार्ल्स गुडइयर और वल्कनाइजेशन की खोज

बता दें कि 19वीं सदी के शुरुआती दशकों में रबर यूरोप और अमेरिका में तेज़ी से लोकप्रिय होने लगा। जूते, कोट, हैट और लाइफ़ जैकेट बनाए जाने लगे, लेकिन रबर की सबसे बड़ी समस्या थी कि मौसम के हिसाब से उसका व्यवहार बदल जाना। ठंड में वह सख्त हो जाता और गर्मी में पिघलने लगता था। 

कई असफल प्रयोगों और कर्ज़ में डूबने के बावजूद, 1839 में चार्ल्स गुडइयर ने सल्फर और आग के प्रयोग से रबर को स्थिर करने की प्रक्रिया खोज ली, जिसे वल्कनाइजेशन कहा गया। इस खोज ने औद्योगिक दुनिया की दिशा बदल दी। बाद में 1880 के दशक में स्कॉटिश वैज्ञानिक जॉन बॉयड डनलप ने हवा भरे टायर का आविष्कार किया, जिसने परिवहन क्रांति को नई रफ्तार दी।

जब रबर बना साम्राज्यवाद का हथियार

बता दें कि जैसे-जैसे रबर की मांग बढ़ी, यूरोपीय देशों ने इसके स्रोतों की तलाश तेज़ कर दी। अफ्रीका में उन्हें इसका विशाल भंडार मिला आज का डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो। उस समय यह इलाका ‘कांगो फ्री स्टेट’ कहलाता था, लेकिन असल में यह बेल्जियम के राजा किंग लियोपॉल्ड द्वितीय की निजी जागीर थी।

बता दें कि इतिहासकारों के अनुसार, रबर के लालच में कांगो को एक विशाल श्रम शिविर में बदल दिया गया। तय मात्रा से कम रबर लाने पर लोगों के हाथ-पैर काट दिए जाते थे। महिलाओं और बच्चों को बंधक बनाया जाता था पूरे गाँव जला दिए जाते थे। अनुमान है कि लियोपॉल्ड के शासनकाल में लगभग एक करोड़ लोगों की मौत हुई, हालांकि आंकड़ों पर बहस हो सकती है, लेकिन अत्याचारों की सच्चाई निर्विवाद है।

सिंथेटिक रबर और नए विवाद

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंथेटिक रबर का विकास हुआ, जिससे प्राकृतिक रबर पर निर्भरता कुछ कम हुई। आज दुनिया में इस्तेमाल होने वाले रबर का आधे से अधिक हिस्सा सिंथेटिक है। फिर भी भारी वाहनों और विमान टायरों के लिए प्राकृतिक रबर अब भी अनिवार्य है। इसकी बढ़ती मांग के चलते दक्षिण-पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है। 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगलिया की एक स्टडी ने चेतावनी दी कि रबर उद्योग जैव-विविधता और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

आधुनिक ज़रूरतें, पुराने ज़ख्म

बता दें कि आज जब दुनिया तेज़ी से औद्योगिक विकास की ओर बढ़ रही है, रबर की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसका इतिहास हमें याद दिलाता है कि तकनीकी प्रगति की कीमत अक्सर इंसानी जानों और प्रकृति की तबाही के रूप में चुकानी पड़ी है। रबर सिर्फ़ एक कच्चा माल नहीं, बल्कि औपनिवेशिक लालच, हिंसा और पर्यावरणीय संकट की एक लंबी दास्तान है—जिसके निशान आज भी दुनिया के कई हिस्सों में देखे जा सकते हैं।


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ऑनलाइन मंगाएं सफेद कद्दू के बीज, NSC दे रहा भरोसेमंद वैरायटी

सफेद कद्दू, जिसे विंटर मेलन या ऐश गार्ड के नाम से भी जाना जाता है, सेहत के साथ-साथ खेती के लिहाज से भी बेहद फायदेमंद माना जाता है। कम लागत और अच्छी पैदावार के कारण इसकी खेती किसानों के लिए लाभ का सौदा साबित हो सकती है।

White pumpkin cultivation
सफेद कद्दू की खेती (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar07 Jan 2026 01:34 PM
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बता दें कि सफेद कद्दू की बेहतर उत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन जरूरी होता है और इसी कड़ी में नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (NSC) किसानों को सफेद कद्दू की उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध करा रहा है। NSC ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि किसान ‘काशी धवल’ किस्म के बीजों से सफेद कद्दू या विंटर मेलन की खेती कर सकते हैं। यह किस्म अधिक उपज देने वाली मानी जाती है। खास बात यह है कि इस किस्म के 5 ग्राम बीज मात्र 20 रुपये में NSC के ऑनलाइन स्टोर पर उपलब्ध हैं।

किसानों के लिए मुनाफे का सौदा

माय स्टोर पर दी गई जानकारी के अनुसार, ‘काशी धवल’ सफेद कद्दू की एक उच्च उत्पादक किस्म है, जिसे इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म की बेलें आमतौर पर 7.5 से 8 मीटर तक फैलती हैं। इसके फल का औसत वजन करीब 11 से 13 किलोग्राम तक होता है, जो इसे बाजार में अच्छी कीमत दिलाने में मदद करता है। बीज बोने से लेकर फसल की कटाई तक इस किस्म को तैयार होने में लगभग 120 दिन का समय लगता है। समय पर देखभाल और उचित कृषि तकनीक अपनाने पर किसान इससे बेहतर पैदावार हासिल कर सकते हैं।

जाने किसानों के लिए बेहतरीन विकल्प

माय स्टोर पर यह बीज NSC Ash Gourd Kashi Dhawal Seed नाम से उपलब्ध हैं। हालांकि, स्टोर की शर्तों के अनुसार ये बीज नॉन-कैंसिलेबल और नॉन-रिटर्नेबल हैं। यानी एक बार ऑर्डर देने के बाद इन्हें न तो रद्द किया जा सकता है और न ही वापस किया जा सकता है। कम कीमत में उपलब्ध उन्नत बीज और अच्छी उपज की संभावनाओं के चलते सफेद कद्दू की यह किस्म किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन सकती है।


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