कम समय में अधिक मुनाफा कमाने की चाह रखने वाले किसानों के लिए खरबूजे की खेती एक बेहतर विकल्प बनकर उभरी है। केवल तीन महीने में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को लाखों रुपये की आमदनी दे रही है।

Melon Cultivation : खरबूजा अपनी मिठास और ताजगी के लिए जाना जाता है। इसका उपयोग कच्ची अवस्था में सब्जी के रूप में और पकने के बाद फल के रूप में किया जाता है। अन्य फलों की तुलना में सस्ता होने के बावजूद इसकी मांग बाजार में बनी रहती है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश के गर्म व शुष्क क्षेत्रों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। राजस्थान में नदियों के किनारे पेटा काश्त पद्धति से खरबूजे की खेती व्यापक रूप से की जा रही है।
बता दें कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार पेटा काश्त में मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और संरक्षित नमी के कारण किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती। इससे खरबूजे की प्राकृतिक खुशबू और स्वाद बरकरार रहता है। यही वजह है कि पेटा काश्त से उगाया गया खरबूजा बाजार में आम खरबूजे की तुलना में अधिक कीमत पर बिकता है।
बता दें कि बांध या नदी का पानी सूखने के बाद खेत में मौजूद नमी के आधार पर जनवरी के अंतिम सप्ताह में बुवाई की जाती है। कुदाली से 10–15 सेमी गहरे गड्ढे बनाकर लाइन से लाइन की दूरी 4 फीट और पौधे से पौधे की दूरी 1 से 1.25 फीट रखी जाती है। तेज हवाओं से नमी और मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए खेत में स्थानीय वनस्पतियों से वायु अवरोधक लाइनें बनाई जाती हैं।
खरबूजा बाड़ी में सबसे अधिक ‘कजरी’ किस्म की बुवाई की जाती है। यह किस्म गहरे हरे से हल्के भूरे रंग की होती है, जिस पर काली-सफेद धारियां होती हैं। इसका औसत वजन 500 ग्राम से 1 किलोग्राम तक होता है। छोटे आकार के कारण यह फल लंबे समय तक ताजा रहता है।
फसल में लगभग दो महीने बाद फूल आना शुरू हो जाता है और ढाई से तीन महीने में खरबूजे बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं। फरवरी-मार्च में बोई गई फसल से जून तक लगातार आय होती रहती है। आईसीएआर के अनुसार, पेटा काश्त तकनीक से खरबूजे की खेती करने वाले किसान एक सीजन में 2 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमा सकते हैं। Melon cultivation