Saturday, 25 May 2024

Special Story : राजस्थान में अपनी ‘दो कमजारियों’ से कैसे निपटेगी कांग्रेस

आर.पी. रघुवंशी नई दिल्ली। राजस्थान कांग्रेस में इन दिनों हो रहे सियासी दंगल ने पार्टी हाईकमान को चिंता में डाल…

Special Story : राजस्थान में अपनी ‘दो कमजारियों’ से कैसे निपटेगी कांग्रेस

आर.पी. रघुवंशी

नई दिल्ली। राजस्थान कांग्रेस में इन दिनों हो रहे सियासी दंगल ने पार्टी हाईकमान को चिंता में डाल दिया है। इस साल के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। ऐसे में पार्टी प्रदेश में अपनी ‘दो कमजारियों’ (अशोक गहलोत और सचिन पायलट) से कैसे निपटेगी, इस पर सभी की निगाहें गड़ी हुईं हैं। माना जा रहा है कि सचिन पायलट के अल्टीमेटम के बाद उनका राजनीतिक भविष्य हाईकमान के फैसले पर निर्भर करेगा।

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गहलोत और पायलट की अदावत की इनसाइड स्टोरी

अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की सियासी अदावत कोई नई नहीं है। इसकी शुरुआत साल 2018 में विधानसभा चुनाव के बाद ही हो गई थी। उस समय सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष थे। तब उन्होंने पूरे प्रदेश की खाक छानी थी। नतीजतन, चुनाव में पार्टी को जीत मिली। लेकिन, सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से एक सीट कम रह गई। 200 सीटों वाली राज्य विधानसभा में कांग्रेस को 100 सीटें मिली थीं। जबकि सरकार बनाने के लिए उसे 101 सीटों की दरकार थी। बताया जाता है कि तब अशोक गहलोत ने बहुजन समाज पार्टी के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में विलय की कामयाब कोशिश की। सियासत के माहिर अशोक गहलोत ने उस समय एक तीर से दो शिकार करने की रणनीति पर भी काम किया। उन्होंने सचिन पायलट का विकल्प तैयार करने के मकसद से नदबई विधानसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर विधायक बने जोगिन्दर सिंह अवाना को आगे किया। यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि सचिन पायलट और जोगिन्दर अवाना, दोनों ही गुर्जर बिरादरी से हैं। यह भी दिलचस्प है कि दोनों ही उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के मूल निवासी हैं। अशोक गहलोत ने गुर्जरों के भगवान माने जाने वाले देवनारायण के नाम से एक मंत्रालय का गठन किया और जोगिन्दर सिंह अवाना को उसका मंत्री बना दिया। लेकिन, तमाम कोशिशों के बावजूद जोगिन्दर सिंह अवाना सचिन पायलट के कद की बराबरी नहीं कर सके।

हाईकमान ने पायलट को बनाया डिप्टी सीएम

सचिन पायलट का मानना था कि उनकी मेहनत की बदौलत ही पार्टी सत्ता तक पहुंची है, इसलिए उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए। लेकिन, हाईकमान इस बात पर राजी नहीं था। पायलट के गुस्से और विरोध को थामने के लिए पार्टी ने उन्हें डिप्टी सीएम बना दिया। उस समय तो मामला शांत हो गया। लेकिन, पायलट अपने पद और गहलोत के बर्ताव से कभी संतुष्ट नहीं हुए। नतीजतन, साल 2020 में सचिन ने 20 विधायकों के साथ बगावत का बिगुल फूंक दिया। वह अपने विधायकों के साथ हरियाणा के गुरुग्राम स्थित मानेसर के एक होटल में रुके। तब आरोप लगाए गए थे कि उनके पीछे भाजपा खड़ी है और उनके रुकने के साथ ही उनकी सुरक्षा का जिम्मा भी हरियाणा की भाजपा सरकार उठा रही है। उस समय तमाम जद्दोजहद के बाद बगावत थमा। लेकिन, सचिन को उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें डिप्टी सीएम के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ा।

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सचिन के सीने में अभी दहक रहे हैं अंगारे

सचिन पायलट को जिस तरह से अशोक गहलोत के साथ ही हाईकमान की उपेक्षाएं झेलनी पड़ीं, उससे उनके सीने में दहक रहे सियासी अंगारे ठंडे नहीं हो रहे हैं। इसके पीछे उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की महत्वाकांक्षा मुख्य वजह मानी जा रही है। साल 2020 के बाद अभी बीते महीने ही सचिन पायलट ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सरकार में हुए भ्रष्टाचार की जांच की मांग को लेकर एक दिन का अनशन किया था। अब सरकार पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने पांच दिवसीय जनसंघर्ष यात्रा निकाली। 11 मई 2023 से अजमेर से जयपुर तक निकाली गई पांच दिवसीय यात्रा के समापन पर सचिन तैश में नजर आए। उत्तेजना में उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम दे दिया। उन्होंने कहा अगर उनकी तीन मांगें नहीं मानी गईं तो वह पूरे प्रदेश में आंदोलन करेंगे।

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सचिन के ऐलान से गहलोत सरकार और हाईकमान असहज

सचिन पायलट के प्रदेशव्यापी आंदोलन से अशोक गहलोत सरकार और पार्टी हाईकमान काफी असहज है। पार्टी चुनावी वर्ष में ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती है, जिससे चुनाव पर ​बुरा असर पड़े। मौजूदा दौर में अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों ही पार्टी की मजबूरी बने हुए हैं। सचिन की संगठन पर अच्छी पकड़ है और गहलोत सरकार चलाने के साथ ही विरोधियों को साधने में माहिर हैं। पार्टी के लिए राज्य में तीसरा कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो इनका विकल्प बन सके। शायद यही मजबूरी, हाईकमान को संयम बरतने पर विवश कर रही है।

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हाईकमान के फैसले पर टिका पायलट का सियासी भविष्य

15 दिनों के अल्टीमेटम के बाद पार्टी में हलचल तेज हो गई है। राजस्थान के प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा एक बैठक कर चुके हैं। वह अपनी रिपोर्ट भी पार्टी अध्यक्ष को सौंप चुके हैं। लेकिन, एक दिन पहले ही पायलट को लेकर उनके सुर कुछ नरम हुए हैं। फिर भी पायलट के अल्टीमेटम की अनदेखी करना ठीक नहीं है। लिहाजा, 31 मई के पहले ही पार्टी को सुलह का कोई रास्ता तो तलाशना ही होगा। राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर हाईकमान ने पायलट को कोई तवज्जो नहीं दी और पायलट अपने आंदोलन के फैसले पर अड़े रहे तो फिर राहें जुदा भी हो सकती हैं। यानि, वे अटकलें जमीन पर उतर सकती हैं, जिसमें ये बात कही जा रही है कि सचिन पायलट राजस्थान में अपनी पार्टी बना कर किंग न सही, किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं।

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