फर्क सिर्फ इतना है कि यहां आपका सोना नहीं, बल्कि आपके डीमैट अकाउंट में पड़े शेयर गिरवी रखे जाते हैं। बैंक या NBFC आपको फंड देता है, आप ब्याज चुकाते हैं और लोन खत्म होते ही वो शेयर्स फिर से आपके पूरी तरह कंट्रोल में आ जाते हैं।

Stock Market : सोने पर लोन लेने के बारे में तो लगभग हर कोई जानता है, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि आप अपने शेयरों के बदले भी लोन ले सकते हैं? आज के दौर में फाइनेंशियल जरूरतें कई बार अचानक सामने आ जाती हैं ऐसे में शेयर को कोलैटरल बनाकर लिया गया लोन एक आसान विकल्प बन सकता है। यह बिल्कुल उसी तरह काम करता है जैसे बैंक में सोने की ज्वेलरी गिरवी रखने पर पैसा मिलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां आपका सोना नहीं, बल्कि आपके डीमैट अकाउंट में पड़े शेयर गिरवी रखे जाते हैं। बैंक या NBFC आपको फंड देता है, आप ब्याज चुकाते हैं और लोन खत्म होते ही वो शेयर्स फिर से आपके पूरी तरह कंट्रोल में आ जाते हैं।
लोन लेने पर आपके शेयर किसी और के नाम नहीं हो जाते, बस उन पर लीन मार्क लगा दिया जाता है यानि बैंक एक तरह से निशान लगा देता है कि ये शेयर अभी गिरवी हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान शेयरों की ओनरशिप पूरी तरह आपके पास ही रहती है। कंपनी डिविडेंड बांटे, बोनस दे या शेयर स्प्लिट हो ये सारे फायदे आपके ही डीमैट अकाउंट में आते रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि लोन चुकाने से पहले आप इन शेयरों को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकते। बाकी हर मायने में वे आपके ही बने रहते हैं।
RBI ने शेयरों पर लोन देने के लिए एक साफ और सख्त नियम तय किया है अधिकतम 50% LTV। मतलब, आपके शेयर जितनी भी कीमत के हों, बैंक उसके सिर्फ आधे मूल्य तक ही लोन देगा। उदाहरण के तौर पर अगर आपके पोर्टफोलियो की मौजूदा वैल्यू 20 लाख रुपये है, तो आपके हाथ में आने वाली अधिकतम लोन राशि 10 लाख रुपये ही होगी। यह लिमिट इसलिए रखी गई है ताकि मार्केट गिरावट के दौरान न तो बैंक को बड़ा झटका लगे और न ही निवेशक को।
VSRK कैपिटल के डायरेक्टर स्वप्निल अग्रवाल साफ चेतावनी देते हैं कि निवेशकों को कभी भी मैक्सिमम 50% LTV तक लोन खींचने की गलती नहीं करनी चाहिए। उनके मुताबिक, समझदार इन्वेस्टर वही है जो थोड़ा कंजरवेटिव रहकर कम LTV पर लोन लेता है। इससे तीन बड़े फायदे मिलते हैं मार्केट गिरने पर बार–बार मार्जिन कॉल आने का खतरा बहुत कम हो जाता है, अचानक कैश का जुगाड़ करने की टेंशन घटती है और ओवरऑल फंड मैनेजमेंट भी आसान रहता है। इस बीच RBI ने भी शेयरों पर लोन के नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा है LTV लिमिट को 50% से बढ़ाकर 60% करने और अधिकतम लोन अमाउंट को 20 लाख से सीधा 1 करोड़ रुपये तक ले जाने की बात चल रही है। लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं, नियम भले ढीले हों, समझदारी अभी भी उसी में है कि आप खुद अपनी रिस्क लिमिट टाइट रखें।
मान लीजिए, आपके पास 20 लाख रुपये के शेयर हैं और आपने उनके बदले 10 लाख रुपये का लोन लिया है। शुरुआत में LTV आराम से 50% है, सब कुछ कंट्रोल में दिखता है। लेकिन जैसे ही मार्केट 20% फिसलता है और आपके शेयरों की वैल्यू 20 लाख से गिरकर 15 लाख रह जाती है, पूरा गणित बदल जाता है। अब वही 10 लाख का लोन 15 लाख के कोलैटरल पर टिकता है और LTV सीधा करीब 66% पर पहुँच जाता है – जो लेंडर की सुरक्षित लिमिट से काफी ऊपर है। ऐसी स्थिति में बैंक या NBFC तुरंत एक्टिव मोड में आ जाता है। आपको मार्जिन कॉल किया जाएगा – साफ शब्दों में कहा जाएगा कि या तो लोन का कुछ हिस्सा तुरंत चुका दीजिए या फिर अतिरिक्त शेयर/कैश गिरवी रखकर LTV को दोबारा नीचे लाइए। आमतौर पर आपके पास सिर्फ 2–3 दिन की ही मोहलत होती है। यदि इस अवधि में आप प्रतिक्रिया नहीं देते, तो लेंडर को पूरा हक होता है कि वह आपके गिरवी शेयरों को मार्केट में बेचकर अपना बकाया वसूल ले। यानी अगर LTV पर नज़र नहीं रखी, तो आपका इन्वेस्टमेंट, आपके सामने ही जबरन बेच दिया जा सकता है।
1. प्लेजेबल पोर्टफोलियो - ब्लूचिप शेयर, मजबूत बैलेंस शीट वाली हाई–क्वालिटी मिडकैप कंपनियाँ और रोज़ाना अच्छे वॉल्यूम में ट्रेड होने वाले लिक्विड, स्थिर स्टॉक इन्हें ही सच मायनों में ‘प्लेजेबल पोर्टफोलियो’ कहा जाता है। ऐसे शेयरों पर ब्रोकर भी अपेक्षाकृत बेहतर मार्जिन देने को तैयार रहते हैं, क्योंकि इनके फिसलने का रिस्क तुलनात्मक रूप से कम होता है। फिर भी समझदार निवेशक यहां भी पूरा ज़ोर लगाने की भूल नहीं करते।
2. जिन्हें कभी प्लेज न करें - स्मॉलकैप, SME शेयर, नई–नई लिस्टेड कंपनियां, कम लिक्विडिटी वाली स्क्रिप्ट्स और तेज़ी-मनोरथ पर चलने वाले मोमेंटम स्टॉक ये सभी पोर्टफोलियो में जितने चमकदार दिखते हैं, जोखिम में उतने ही खतरनाक साबित होते हैं। इन शेयरों की कीमतें पलभर में ऊपर जाती हैं, तो अगले ही पल धड़ाम से नीचे भी गिर सकती हैं। ऐसी अचानक गिरावट सबसे पहले मार्जिन कॉल को ट्रिगर करती है और कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि ब्रोकर को मजबूरन आपके शेयर बेचने पड़ते हैं। यही वजह है कि एक्सपर्ट साफ चेतावनी देते हैं ऐसे अस्थिर स्टॉक्स को कभी भी लोन लेकर या गिरवी रखकर खेलने की गलती न करें, वरना आपका पोर्टफोलियो एक झटके में ‘हाई-रिस्क गेम’ बन सकता है।
मान लीजिए आपके पास 20 लाख रुपये के शेयर हैं, जिनके बदले आपने 10 लाख का लोन लिया है। शुरुआत में LTV 50% था, सब नॉर्मल लग रहा था। लेकिन जैसे ही मार्केट फिसला और आपके शेयरों की वैल्यू गिरकर 15 लाख पर आ गई, पूरा हिसाब गड़बड़ा गया। अब LTV बढ़कर करीब 66% पहुँच जाता है, जो बैंक की तय लिमिट से काफी ऊपर है। यहीं से असली दबाव शुरू होता है। ऐसी स्थिति में बैंक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता। लेंडर की तरफ से आपको तुरंत मार्जिन कॉल किया जाता है। मतलब साफ-साफ संदेश या तो कुछ हिस्सा लोन का तुरंत चुका दें, या फिर अतिरिक्त शेयर/कैश गिरवी रखें ताकि LTV दोबारा सुरक्षित दायरे में आ सके। आम तौर पर आपके पास केवल 2–3 दिन का ही समय होता है। अगर इस डेडलाइन के भीतर आप कदम नहीं उठाते, तो बैंक को अधिकार होता है कि वह आपके गिरवी शेयरों को मार्केट में बेचकर अपना पैसा निकाल ले। यानी अगर आप सतर्क नहीं रहे, तो आपकी लॉन्ग–टर्म इन्वेस्टमेंट मजबूरी में डिस्ट्रेस सेल बन सकती है। Stock Market