महिला आरक्षण को लेकर सरकार की बड़ी तैयारी, लॉटरी से होगा सीटों का चयन
देश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा महिला आरक्षण अब तय समय से पहले लागू हो सकता है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से ही इस व्यवस्था को अमल में लाने की तैयारी में जुटी है। इसके लिए 2023 में पारित कानून में संशोधन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

Women's Reservation : देश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा महिला आरक्षण अब तय समय से पहले लागू हो सकता है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से ही इस व्यवस्था को अमल में लाने की तैयारी में जुटी है। इसके लिए 2023 में पारित कानून में संशोधन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। पहले यह माना जा रहा था कि महिला आरक्षण 2034 के आम चुनाव के बाद लागू होगा, लेकिन अब सरकार इसे अगले लोकसभा चुनाव से ही लागू करने के पक्ष में दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देने से पहले सरकार विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। संभावना है कि संशोधन से जुड़ा विधेयक पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने लाया जाएगा और वहां से मंजूरी मिलने के बाद संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा। सरकार की मंशा है कि 2011 की जनगणना को आधार बनाकर 2029 के चुनाव में ही महिला आरक्षण लागू कर दिया जाए। यदि ऐसा होता है, तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों का पूरा गणित बदल सकता है।
15 साल बाद होगा रोटेशन
मिली जानकारी के अनुसार, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना है। इसके बाद नई कुल सीटों में 33 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि किन सीटों को महिला आरक्षण के दायरे में रखा जाएगा। सरकारी हलकों में चर्चा है कि इसके लिए लॉटरी प्रणाली अपनाई जा सकती है। यानी जिन सीटों का चयन आरक्षण के लिए होगा, उनका निर्धारण ड्रॉ के जरिए किया जाएगा। एक बार किसी सीट पर महिला आरक्षण लागू हो गया तो वह 15 वर्षों तक उसी स्वरूप में बनी रह सकती है। इसके बाद रोटेशन की प्रक्रिया लागू की जाएगी।
एससी-एसटी सीटों पर भी लागू होगा आरक्षण का प्रावधान
महिला आरक्षण को लेकर एक बड़ा प्रश्न अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को लेकर भी उठ रहा है। इस पर जो संकेत मिल रहे हैं, उनके अनुसार यह व्यवस्था वर्टिकल आरक्षण के रूप में लागू होगी। इसका मतलब यह है कि एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं। प्रस्तावित नई व्यवस्था के तहत इनकी संख्या बढ़कर 136 तक पहुंच सकती है। इसी तरह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 47 से बढ़कर करीब 70 होने की संभावना जताई जा रही है। इन बढ़ी हुई सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई हिस्सा तय किया जाएगा। इस तरह वर्गवार महिला प्रतिनिधित्व की भी एक संरचना बन जाएगी।
दक्षिण के दलों का समर्थन क्यों अहम माना जा रहा है
महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराने के लिए सरकार ने राजनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी है। इसी सिलसिले में सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई गैर-कांग्रेसी विपक्षी नेताओं से बातचीत की। इस बैठक में समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, एनसीपी-एसपी की नेता सुप्रिया सुले, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के संजय राउत और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल बताए गए। सरकारी सूत्रों के अनुसार, तेलुगु देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दक्षिण भारत के प्रमुख दलों ने भी इस प्रस्ताव को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि सरकार ने सीटों के पुनर्निर्धारण और आरक्षण के अनुपात के लिए 2011 की जनगणना को आधार मानने का निर्णय लिया है। दक्षिणी राज्यों की लंबे समय से यह चिंता रही है कि नई जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा होने पर उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में 2011 के आंकड़ों को आधार बनाए रखने का फैसला उनके लिए राहत की तरह देखा जा रहा है।
बदल सकती है प्रतिनिधित्व की तस्वीर
अगर यह प्रस्ताव 2029 से लागू होता है, तो भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी एक नए चरण में प्रवेश कर सकती है। लोकसभा और विधानसभाओं में उनकी संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी, साथ ही सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का स्वरूप भी बदलेगा। हालांकि अंतिम तस्वीर तभी साफ होगी जब सरकार संशोधन विधेयक संसद में लाकर उसका विधायी रास्ता पूरा करेगी। Women's Reservation
Women's Reservation : देश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा महिला आरक्षण अब तय समय से पहले लागू हो सकता है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से ही इस व्यवस्था को अमल में लाने की तैयारी में जुटी है। इसके लिए 2023 में पारित कानून में संशोधन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। पहले यह माना जा रहा था कि महिला आरक्षण 2034 के आम चुनाव के बाद लागू होगा, लेकिन अब सरकार इसे अगले लोकसभा चुनाव से ही लागू करने के पक्ष में दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देने से पहले सरकार विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। संभावना है कि संशोधन से जुड़ा विधेयक पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने लाया जाएगा और वहां से मंजूरी मिलने के बाद संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा। सरकार की मंशा है कि 2011 की जनगणना को आधार बनाकर 2029 के चुनाव में ही महिला आरक्षण लागू कर दिया जाए। यदि ऐसा होता है, तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों का पूरा गणित बदल सकता है।
15 साल बाद होगा रोटेशन
मिली जानकारी के अनुसार, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना है। इसके बाद नई कुल सीटों में 33 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि किन सीटों को महिला आरक्षण के दायरे में रखा जाएगा। सरकारी हलकों में चर्चा है कि इसके लिए लॉटरी प्रणाली अपनाई जा सकती है। यानी जिन सीटों का चयन आरक्षण के लिए होगा, उनका निर्धारण ड्रॉ के जरिए किया जाएगा। एक बार किसी सीट पर महिला आरक्षण लागू हो गया तो वह 15 वर्षों तक उसी स्वरूप में बनी रह सकती है। इसके बाद रोटेशन की प्रक्रिया लागू की जाएगी।
एससी-एसटी सीटों पर भी लागू होगा आरक्षण का प्रावधान
महिला आरक्षण को लेकर एक बड़ा प्रश्न अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को लेकर भी उठ रहा है। इस पर जो संकेत मिल रहे हैं, उनके अनुसार यह व्यवस्था वर्टिकल आरक्षण के रूप में लागू होगी। इसका मतलब यह है कि एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं। प्रस्तावित नई व्यवस्था के तहत इनकी संख्या बढ़कर 136 तक पहुंच सकती है। इसी तरह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 47 से बढ़कर करीब 70 होने की संभावना जताई जा रही है। इन बढ़ी हुई सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई हिस्सा तय किया जाएगा। इस तरह वर्गवार महिला प्रतिनिधित्व की भी एक संरचना बन जाएगी।
दक्षिण के दलों का समर्थन क्यों अहम माना जा रहा है
महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराने के लिए सरकार ने राजनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी है। इसी सिलसिले में सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई गैर-कांग्रेसी विपक्षी नेताओं से बातचीत की। इस बैठक में समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, एनसीपी-एसपी की नेता सुप्रिया सुले, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के संजय राउत और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल बताए गए। सरकारी सूत्रों के अनुसार, तेलुगु देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दक्षिण भारत के प्रमुख दलों ने भी इस प्रस्ताव को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि सरकार ने सीटों के पुनर्निर्धारण और आरक्षण के अनुपात के लिए 2011 की जनगणना को आधार मानने का निर्णय लिया है। दक्षिणी राज्यों की लंबे समय से यह चिंता रही है कि नई जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा होने पर उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में 2011 के आंकड़ों को आधार बनाए रखने का फैसला उनके लिए राहत की तरह देखा जा रहा है।
बदल सकती है प्रतिनिधित्व की तस्वीर
अगर यह प्रस्ताव 2029 से लागू होता है, तो भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी एक नए चरण में प्रवेश कर सकती है। लोकसभा और विधानसभाओं में उनकी संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी, साथ ही सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का स्वरूप भी बदलेगा। हालांकि अंतिम तस्वीर तभी साफ होगी जब सरकार संशोधन विधेयक संसद में लाकर उसका विधायी रास्ता पूरा करेगी। Women's Reservation












