ओह! तो यह है डोनाल्ड ट्रंप का सबसे बड़ा डर? इसलिए बार-बार लगाते हैं टैरिफ!

Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की सुरक्षा के लिए क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भरता को खतरा बताया और सहयोगी देशों को टैरिफ की धमकी दी।

Donald Trump
डोनाल्ड ट्रंप का सबसे बड़ा डर
locationभारत
userअसमीना
calendar16 Jan 2026 12:07 PM
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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने सख्त फैसलों और धमकियों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार मामला सिर्फ टैरिफ या ट्रेड वॉर का नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अहम और रणनीतिक संसाधनों क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़ा है। ट्रंप का मानना है कि इन खनिजों पर अमेरिका की विदेशी निर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। यही वजह है कि उन्होंने सहयोगी देशों को साफ चेतावनी दी है कि अगर तय समय में समझौते नहीं हुए तो भारी टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।

‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत नई चेतावनी

डोनाल्ड ट्रंप की मशहूर ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी एक बार फिर पूरी ताकत से सामने आई है। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी और व्यापारिक साझेदार देशों को निर्देश दिया है कि वे 180 दिनों के भीतर अहम खनिजों और रेयर अर्थ की सप्लाई को लेकर अमेरिका के साथ ठोस और कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते करें। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका बिना किसी अतिरिक्त समीक्षा के सख्त कदम उठा सकता है।

आखिर कौन से खनिज हैं अमेरिका के लिए सबसे जरूरी?

लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स आज की दुनिया में सिर्फ खनिज नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी और पावर का आधार बन चुके हैं। इनका इस्तेमाल एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस सिस्टम, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी में होता है। ट्रंप का कहना है कि इन खनिजों का विदेशों में प्रोसेस होना अमेरिका की रणनीतिक मजबूती को कमजोर करता है।

चीन की पकड़ से अमेरिका क्यों परेशान है?

इस पूरी रणनीति की जड़ में चीन है। फिलहाल दुनिया की 70 फीसदी से ज्यादा रेयर अर्थ रिफाइनिंग और बैटरी-ग्रेड मिनरल प्रोडक्शन पर चीन का दबदबा है। अमेरिका को डर है कि अगर भविष्य में सप्लाई बाधित हुई तो उसकी डिफेंस, ऑटो और टेक इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ट्रंप सप्लाई चेन को चीन जैसे एकतरफा स्रोतों से हटाना चाहते हैं।

ऑटो और EV सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर

इस फैसले का सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर पर देखने को मिल सकता है। EV की बढ़ती मांग के कारण बैटरी मटीरियल की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में कंपनियों को अपने कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय करने, नए खनिज स्रोत खोजने और प्रोडक्शन स्ट्रैटेजी बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। इसका असर गाड़ियों की कीमत, प्रोडक्शन टाइमलाइन और इलेक्ट्रिफिकेशन में होने वाले निवेश पर भी पड़ सकता है।

बातचीत के लिए तय की गई डेडलाइन

ट्रंप प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 13 जुलाई 2026 तक की समयसीमा तय की है। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर और कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक को नए या विस्तारित समझौते कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मकसद यह है कि प्रोसेस किए गए खनिजों और उनसे बने उत्पादों की सप्लाई अमेरिका के नियंत्रण में या भरोसेमंद साझेदारों के जरिए हो।

समझौता नहीं तो टैरिफ तय

अगर तय समय सीमा के भीतर कोई समझौता नहीं होता है तो ट्रंप के पास सीधे सख्त कदम उठाने का अधिकार होगा। इसमें ऊंचे टैरिफ, आयात कोटा या न्यूनतम आयात कीमतें लागू करना शामिल है। इसके अलावा सहयोगी देशों में प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने, चीन के बाहर निवेश को बढ़ावा देने और लंबे समय के सप्लाई एग्रीमेंट जैसे उपाय भी प्रस्तावित हैं।

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ट्रंप ने मुनीर की तारीफ की, फिर पाकिस्तानियों पर वीजा पाबंदी क्यों?

अमेरिकी प्रशासन ने एक साथ 75 देशों को अपनी नई इमिग्रेशन नीति के दायरे में रखते हुए स्थायी निवास (इमिग्रेंट वीजा) की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया। इस सूची में पाकिस्तान भी शामिल है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब पाकिस्तानी नागरिक ग्रीन कार्ड या स्थायी बसावट के लिए आवेदन नहीं कर पाएंगे।

yarana
डोनाल्ड ट्रंप और आसिम मुनीर
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar15 Jan 2026 05:07 PM
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Visa Restrictions : डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने हाल के दिनों में पाकिस्तान में उम्मीदें जगा दी थीं। अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को खुले मंच से मेरा पसंदीदा जनरल कहना इस बात का संकेत माना गया कि वॉशिंगटन-इस्लामाबाद रिश्तों में गर्मजोशी लौट रही है। लेकिन इसी बीच अमेरिका से आया एक आदेश पाकिस्तानियों के लिए किसी झटके से कम नहीं था।

अमेरिका ने क्या फैसला लिया?

अमेरिकी प्रशासन ने एक साथ 75 देशों को अपनी नई इमिग्रेशन नीति के दायरे में रखते हुए स्थायी निवास (इमिग्रेंट वीजा) की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया। इस सूची में पाकिस्तान भी शामिल है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब पाकिस्तानी नागरिक ग्रीन कार्ड या स्थायी बसावट के लिए आवेदन नहीं कर पाएंगे। परिवार के आधार पर या रोजगार के जरिए मिलने वाले इमिग्रेंट वीजा फिलहाल ठप रहेंगे। हालांकि यह फैसला पर्यटन, पढ़ाई या अस्थायी कामकाज से जुड़े वीजा पर सीधे लागू नहीं होता, लेकिन उनकी जांच भी पहले से अधिक सख्त हो सकती है।

फिर ट्रंप की तारीफों का क्या मतलब?

यहां सबसे अहम बात समझने की है। ट्रंप द्वारा जनरल आसिम मुनीर की प्रशंसा एक राजनीतिक और सैन्य बयान था। इसका मकसद रणनीतिक रिश्तों और सुरक्षा सहयोग को दर्शाना था। वहीं वीजा रोकने का फैसला पूरी तरह अमेरिका की आंतरिक इमिग्रेशन नीति से जुड़ा है। यह व्यक्तिगत रिश्तों या किसी एक देश से नाराजगी का नतीजा नहीं है। अमेरिकी सरकार का तर्क है कि कुछ देशों से आने वाले आवेदकों के अमेरिका में बसने के बाद सरकारी सहायता पर निर्भर हो जाने का खतरा ज्यादा रहता है। इसी आधार पर उन्हें हाई-रिस्क कैटेगरी में रखा गया है।

पाकिस्तान ही क्यों?

असल में यह फैसला केवल पाकिस्तान के लिए नहीं है। इस सूची में एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका के कई देश शामिल हैं। इसका मतलब साफ है कि यह कोई पाकिस्तान-विरोधी विशेष सजा नहीं बल्कि एक सामूहिक नीति निर्णय है। लेकिन पाकिस्तान में इसका असर ज्यादा महसूस किया जा रहा है क्योंकि वहां बड़ी संख्या में लोग लंबे समय से अमेरिका में बसने का सपना देखते रहे हैं।

पाकिस्तानी जनता के लिए क्यों बड़ा झटका?

ट्रंप के हालिया रुख और बयानों के बाद पाकिस्तान में यह उम्मीद बनी थी कि अमेरिका के दरवाजे फिर से खुलेंगे। इमिग्रेशन आसान होगा। लेकिन इस आदेश ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अमेरिका में स्थायी जीवन की योजना बना रहे हजारों पाकिस्तानी परिवारों के लिए यह फैसला किसी अचानक लगे ब्रेक जैसा है। पाकिस्तान के साथ सैन्य या राजनीतिक समीकरण बेहतर होने का मतलब यह नहीं कि इमिग्रेशन नियम भी ढीले हो जाएंगे। अमेरिका का यह फैसला भावनाओं पर नहीं, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक गणनाओं पर आधारित है। यानी, तारीफ अपनी जगह है लेकिन अमेरिका में बसने का रास्ता फिलहाल पाकिस्तानियों के लिए बंद है।

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मक्का और मदीना का वैश्विक धार्मिक महत्व

सऊदी अरब में स्थित मक्का की ओर हर साल हज-उमरा के लिए उमड़ता सैलाब इंसान को समानता, अनुशासन और विनम्रता का सबक देता है, जबकि मदीना की फिजा में पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) की सादगी, करुणा और भाईचारे की परंपरा आज भी महसूस होती है।

मक्का मदीना
मक्का मदीना
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar15 Jan 2026 01:44 PM
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Mecca and Medina : इस्लाम की पहचान जिन दो मुकद्दस शहरों से सबसे गहराई से जुड़ी है, वे हैं मक्का और मदीना और ये दोनों ही सऊदी अरब की धरती पर आस्था के सबसे बड़े प्रकाश-स्तंभ की तरह खड़े हैं। ये शहर केवल नक्शे पर दर्ज जगहें नहीं, बल्कि करोड़ों मुसलमानों के लिए ईमान की दिशा, इतिहास की धड़कन और रूहानी सुकून का केंद्र हैं। सऊदी अरब में स्थित मक्का की ओर हर साल हज-उमरा के लिए उमड़ता सैलाब इंसान को समानता, अनुशासन और विनम्रता का सबक देता है, जबकि मदीना की फिजा में पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) की सादगी, करुणा और भाईचारे की परंपरा आज भी महसूस होती है।

मक्का का महत्व

मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है। यहीं स्थित है काबा, जिसे इस्लामी मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनके पुत्र हज़रत इस्माईल ने अल्लाह के आदेश पर निर्मित किया था। काबा की ओर रुख कर दुनिया भर के मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ अदा करते हैं। यह एक ऐसा आध्यात्मिक धागा है जो विश्व के अलग-अलग कोनों में रहने वाले मुसलमानों को एक दिशा और एक उद्देश्य में बाँधता है। मक्का में हज का आयोजन होता है, जिसे इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक माना गया है। हर सक्षम मुस्लिम पर जीवन में एक बार हज करना फ़र्ज़ है। हर वर्ष लाखों लोग, भाषा, रंग और राष्ट्रीयता की सीमाओं से ऊपर उठकर, एक समान वस्त्र (एहराम) में मक्का पहुँचते हैं। यह दृश्य मानव समानता और विनम्रता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। मक्का का धार्मिक महत्व सिर्फ हज तक सीमित नहीं है। उमराह वर्ष भर की जा सकती है और यह भी आध्यात्मिक शांति और आत्म-शुद्धि का माध्यम मानी जाती है। आधुनिक सऊदी अरब ने मक्का में बुनियादी ढाँचे का बड़े पैमाने पर विकास किया है, ताकि तीर्थयात्रियों की सुरक्षा, सुविधा और सुचारु प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।

क्यों मदीना की ज़ियारत खास मानी जाती है

मदीना जिसे पहले यथ्रिब कहा जाता था, इस्लाम का दूसरा सबसे पवित्र शहर है। यहीं पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मक्का से हिजरत की थी। यह घटना इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत का आधार बनी। मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद ने एक ऐसे समाज की स्थापना की, जिसकी नींव न्याय, सह-अस्तित्व और मानव गरिमा पर रखी गई। मदीना की पहचान है मस्जिद-ए-नबवी, जहाँ पैग़ंबर मुहम्मद की क़ब्र मुबारक स्थित है। यह मस्जिद इस्लामी इतिहास का जीवंत साक्ष्य है। कहा जाता है कि मस्जिद-ए-नबवी में अदा की गई एक नमाज़ का सवाब सामान्य स्थानों से कई गुना अधिक होता है। इसलिए हज या उमराह पर जाने वाले ज़्यादातर श्रद्धालु मदीना की ज़ियारत अवश्य करते हैं। मदीना को “शहर-ए-अमन” यानी शांति का नगर भी कहा जाता है। यहाँ पैग़ंबर मुहम्मद ने विभिन्न समुदायों के बीच आपसी समझ और सहयोग का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया। मदीना चार्टर (संविधान) को दुनिया के शुरुआती लिखित सामाजिक समझौतों में गिना जाता है, जिसने धार्मिक सहिष्णुता और नागरिक अधिकारों की अवधारणा को मजबूती दी।

मक्का–मदीना: आध्यात्मिकता से आधुनिकता तक

आज के दौर में मक्का और मदीना आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हैं, लेकिन उनकी आत्मा आज भी वैसी ही पवित्र और आध्यात्मिक बनी हुई है। सऊदी अरब सरकार ने तीर्थयात्रियों के लिए स्मार्ट ट्रांसपोर्ट, डिजिटल गाइडेंस, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा व्यवस्था को अत्याधुनिक बनाया है। यह बदलाव दर्शाता है कि परंपरा और प्रगति साथ-साथ चल सकती हैं। इन शहरों का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक भी है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति अनुशासन, सहनशीलता और सेवा की भावना का अनुभव करता है। मक्का और मदीना दुनिया को यह संदेश देते हैं कि सच्ची आस्था इंसान को बेहतर इंसान बनाती है।

वैश्विक मानवता के लिए संदेश

मक्का और मदीना का संदेश समय और सीमाओं से परे है। ये शहर समानता, एकता और शांति की बात करते हैं। हज के दौरान अमीर-गरीब, शासक-श्रमिक सभी एक ही पंक्ति में खड़े होते हैं यह दृश्य आधुनिक दुनिया को सामाजिक न्याय का सशक्त संदेश देता है। Mecca and Medina

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