ओह! तो यह है डोनाल्ड ट्रंप का सबसे बड़ा डर? इसलिए बार-बार लगाते हैं टैरिफ!
Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की सुरक्षा के लिए क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भरता को खतरा बताया और सहयोगी देशों को टैरिफ की धमकी दी।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने सख्त फैसलों और धमकियों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार मामला सिर्फ टैरिफ या ट्रेड वॉर का नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अहम और रणनीतिक संसाधनों क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़ा है। ट्रंप का मानना है कि इन खनिजों पर अमेरिका की विदेशी निर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। यही वजह है कि उन्होंने सहयोगी देशों को साफ चेतावनी दी है कि अगर तय समय में समझौते नहीं हुए तो भारी टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत नई चेतावनी
डोनाल्ड ट्रंप की मशहूर ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी एक बार फिर पूरी ताकत से सामने आई है। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी और व्यापारिक साझेदार देशों को निर्देश दिया है कि वे 180 दिनों के भीतर अहम खनिजों और रेयर अर्थ की सप्लाई को लेकर अमेरिका के साथ ठोस और कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते करें। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका बिना किसी अतिरिक्त समीक्षा के सख्त कदम उठा सकता है।
आखिर कौन से खनिज हैं अमेरिका के लिए सबसे जरूरी?
लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स आज की दुनिया में सिर्फ खनिज नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी और पावर का आधार बन चुके हैं। इनका इस्तेमाल एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस सिस्टम, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी में होता है। ट्रंप का कहना है कि इन खनिजों का विदेशों में प्रोसेस होना अमेरिका की रणनीतिक मजबूती को कमजोर करता है।
चीन की पकड़ से अमेरिका क्यों परेशान है?
इस पूरी रणनीति की जड़ में चीन है। फिलहाल दुनिया की 70 फीसदी से ज्यादा रेयर अर्थ रिफाइनिंग और बैटरी-ग्रेड मिनरल प्रोडक्शन पर चीन का दबदबा है। अमेरिका को डर है कि अगर भविष्य में सप्लाई बाधित हुई तो उसकी डिफेंस, ऑटो और टेक इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ट्रंप सप्लाई चेन को चीन जैसे एकतरफा स्रोतों से हटाना चाहते हैं।
ऑटो और EV सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर पर देखने को मिल सकता है। EV की बढ़ती मांग के कारण बैटरी मटीरियल की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में कंपनियों को अपने कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय करने, नए खनिज स्रोत खोजने और प्रोडक्शन स्ट्रैटेजी बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। इसका असर गाड़ियों की कीमत, प्रोडक्शन टाइमलाइन और इलेक्ट्रिफिकेशन में होने वाले निवेश पर भी पड़ सकता है।
बातचीत के लिए तय की गई डेडलाइन
ट्रंप प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 13 जुलाई 2026 तक की समयसीमा तय की है। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर और कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक को नए या विस्तारित समझौते कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मकसद यह है कि प्रोसेस किए गए खनिजों और उनसे बने उत्पादों की सप्लाई अमेरिका के नियंत्रण में या भरोसेमंद साझेदारों के जरिए हो।
समझौता नहीं तो टैरिफ तय
अगर तय समय सीमा के भीतर कोई समझौता नहीं होता है तो ट्रंप के पास सीधे सख्त कदम उठाने का अधिकार होगा। इसमें ऊंचे टैरिफ, आयात कोटा या न्यूनतम आयात कीमतें लागू करना शामिल है। इसके अलावा सहयोगी देशों में प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने, चीन के बाहर निवेश को बढ़ावा देने और लंबे समय के सप्लाई एग्रीमेंट जैसे उपाय भी प्रस्तावित हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने सख्त फैसलों और धमकियों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार मामला सिर्फ टैरिफ या ट्रेड वॉर का नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अहम और रणनीतिक संसाधनों क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़ा है। ट्रंप का मानना है कि इन खनिजों पर अमेरिका की विदेशी निर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। यही वजह है कि उन्होंने सहयोगी देशों को साफ चेतावनी दी है कि अगर तय समय में समझौते नहीं हुए तो भारी टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत नई चेतावनी
डोनाल्ड ट्रंप की मशहूर ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी एक बार फिर पूरी ताकत से सामने आई है। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी और व्यापारिक साझेदार देशों को निर्देश दिया है कि वे 180 दिनों के भीतर अहम खनिजों और रेयर अर्थ की सप्लाई को लेकर अमेरिका के साथ ठोस और कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते करें। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका बिना किसी अतिरिक्त समीक्षा के सख्त कदम उठा सकता है।
आखिर कौन से खनिज हैं अमेरिका के लिए सबसे जरूरी?
लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स आज की दुनिया में सिर्फ खनिज नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी और पावर का आधार बन चुके हैं। इनका इस्तेमाल एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस सिस्टम, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी में होता है। ट्रंप का कहना है कि इन खनिजों का विदेशों में प्रोसेस होना अमेरिका की रणनीतिक मजबूती को कमजोर करता है।
चीन की पकड़ से अमेरिका क्यों परेशान है?
इस पूरी रणनीति की जड़ में चीन है। फिलहाल दुनिया की 70 फीसदी से ज्यादा रेयर अर्थ रिफाइनिंग और बैटरी-ग्रेड मिनरल प्रोडक्शन पर चीन का दबदबा है। अमेरिका को डर है कि अगर भविष्य में सप्लाई बाधित हुई तो उसकी डिफेंस, ऑटो और टेक इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ट्रंप सप्लाई चेन को चीन जैसे एकतरफा स्रोतों से हटाना चाहते हैं।
ऑटो और EV सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर पर देखने को मिल सकता है। EV की बढ़ती मांग के कारण बैटरी मटीरियल की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में कंपनियों को अपने कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय करने, नए खनिज स्रोत खोजने और प्रोडक्शन स्ट्रैटेजी बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। इसका असर गाड़ियों की कीमत, प्रोडक्शन टाइमलाइन और इलेक्ट्रिफिकेशन में होने वाले निवेश पर भी पड़ सकता है।
बातचीत के लिए तय की गई डेडलाइन
ट्रंप प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 13 जुलाई 2026 तक की समयसीमा तय की है। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर और कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक को नए या विस्तारित समझौते कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मकसद यह है कि प्रोसेस किए गए खनिजों और उनसे बने उत्पादों की सप्लाई अमेरिका के नियंत्रण में या भरोसेमंद साझेदारों के जरिए हो।
समझौता नहीं तो टैरिफ तय
अगर तय समय सीमा के भीतर कोई समझौता नहीं होता है तो ट्रंप के पास सीधे सख्त कदम उठाने का अधिकार होगा। इसमें ऊंचे टैरिफ, आयात कोटा या न्यूनतम आयात कीमतें लागू करना शामिल है। इसके अलावा सहयोगी देशों में प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने, चीन के बाहर निवेश को बढ़ावा देने और लंबे समय के सप्लाई एग्रीमेंट जैसे उपाय भी प्रस्तावित हैं।












