NEET PG 2025 Cut Off में बड़ा बदलाव, सोशल मीडिया पर हंगामा

NEET PG: NEET PG 2025 Cut Off में बड़ी कटौती के बाद माइनस 40 पर्सेंटाइल वाले उम्मीदवारों को भी PG मेडिकल एडमिशन की अनुमति मिल गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के इस फैसले पर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है। जानिए नया कट ऑफ क्या है, किन कैटेगरी को फायदा मिलेगा और सरकार ने यह फैसला क्यों लिया?

Neet
NEET PG Cut Off
locationभारत
userअसमीना
calendar14 Jan 2026 02:36 PM
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भारत के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा NEET PG 2025 के क्वालिफाइंग कट-ऑफ में भारी कमी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है। इस फैसले के तहत अब SC, ST और OBC कैटेगरी के कैंडिडेट्स माइनस 40 पर्सेंटाइल तक स्कोर करने के बावजूद MS और MD जैसे पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स में एडमिशन के लिए योग्य माने जाएंगे। वहीं जनरल और EWS कैटेगरी के लिए भी कट-ऑफ में राहत दी गई है। सरकार का कहना है कि यह फैसला हजारों खाली पड़ी PG मेडिकल सीटों को भरने के लिए लिया गया है लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे मेडिकल क्वालिटी पर असर पड़ेगा?

क्या है NEET PG 2025 का नया Cut Off Criteria?

अब तक NEET PG में SC, ST और OBC उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग कट-ऑफ 40वां पर्सेंटाइल था यानी लगभग 800 में से 230–240 अंक। नए आदेश के अनुसार इस कट-ऑफ को घटाकर 0 पर्सेंटाइल कर दिया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि निगेटिव मार्क्स लाने वाला कैंडिडेट भी सीट उपलब्ध होने की स्थिति में PG मेडिकल कोर्स में दाखिला पा सकता है। यही बात सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा विवाद का कारण बन रही है।

सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

दरअसल NEET PG 2025 की एडमिशन प्रक्रिया काफी देरी से चल रही है। अभी तक तीसरी काउंसलिंग भी शुरू नहीं हो पाई है और अनुमान है कि 20,000 से ज्यादा PG मेडिकल सीटें खाली रह सकती थीं। मंत्रालय का मानना है कि डॉक्टरों की कमी और सीटों की बर्बादी रोकने के लिए कट-ऑफ में ढील जरूरी थी। सरकार इसे एक व्यावहारिक समाधान बता रही है।

सोशल मीडिया पर क्यों भड़का गुस्सा?

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर डॉक्टरों और आम लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। एक डॉक्टर ने लिखा कि यह शायद दुनिया का इकलौता देश है जहां जीवन और मृत्यु से जुड़े पेशे में क्वालिटी से समझौता किया जा रहा है। वहीं एक अन्य यूजर ने कहा कि जो लोग यह पॉलिसी बना रहे हैं वे खुद इन डॉक्टरों से इलाज नहीं कराएंगे बल्कि महंगे अस्पतालों में जाएंगे। आम और गरीब लोग ही इसका असर झेलेंगे।

“5 साल MBBS करने के बाद सब बराबर होते हैं” वाली दलील

कुछ लोगों का मानना है कि MBBS पूरा करने के बाद सभी डॉक्टर एक जैसी बुनियादी ट्रेनिंग पा चुके होते हैं, इसलिए PG में कट-ऑफ कम करना इतना खतरनाक नहीं है। वहीं दूसरी तरफ कई एक्सपर्ट्स कहते हैं कि स्पेशलिस्ट डॉक्टर बनने के लिए मेरिट और स्किल सबसे अहम फैक्टर होने चाहिए क्योंकि PG लेवल पर डॉक्टर सीधे जटिल बीमारियों का इलाज करते हैं।

क्या इससे मरीजों की सुरक्षा पर असर पड़ेगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस फैसले से मरीजों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। आलोचकों का कहना है कि कम मेरिट वाले कैंडिडेट्स को स्पेशलिस्ट ट्रेनिंग देना भविष्य में हेल्थकेयर सिस्टम के लिए जोखिम भरा हो सकता है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि PG ट्रेनिंग के दौरान डॉक्टरों की कड़ी निगरानी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग होती है जिससे क्वालिटी कंट्रोल बना रहता है।

NEET PG Cut Off विवाद का बड़ा सच

यह विवाद सिर्फ कट-ऑफ का नहीं है बल्कि यह भारत के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम, आरक्षण नीति और हेल्थकेयर क्वालिटी से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सीटें खाली जाने का डर है तो दूसरी तरफ मरीजों की जान से जुड़ी चिंताएं हैं। यही वजह है कि NEET PG 2025 Cut Off को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही।

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किसान के लिए धन की देवी बन गई है भैंस

हरियाणा के अंबाला क्षेत्र के साहा गाँव में रहने वाले रविन्द्र कुमार उर्फ बिल्लू की मुर्रा नस्ल की भैंस की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है। यूट्यूब पर तो बिल्लू की मुर्रा नस्ल की भैंस की धूम मची हुई है।

अंबाला के किसान बिल्लू की मुर्रा भैंस ‘सुंदरा’
अंबाला के किसान बिल्लू की मुर्रा भैंस ‘सुंदरा’
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 02:25 PM
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Murrah buffalo : लक्ष्मी माता को धन की देवी कहा जाता है। धन की देवी के रूप में लक्ष्मी माता की ही पूजा की जाती है। एक किसान के लिए लक्ष्मी माता नहीं बल्कि भैंस धन की देवी बन गई है। भैंस के द्वारा यह साधारण किसान खूब मालामाल हो रहा है। भैंस के कारण ही इस किसान को एक ट्रेक्टर तथा एक बुलट मोटर साइकिल ईनाम में मिले हैं। इस किसान की भैंस ने एक दिन में 30 किलो दूध देने का रिकार्ड बनाया है। 

साधारण किसान बिल्लू को भैंस ने कर दिया मालामाल

भैंस के धन की देवी बनने का यह अनोखा मामला हरियाणा प्रदेश के अंबाला क्षेत्र का है। अंबाला में रहने वाले किसान रविन्द्र कुमार उर्फ बिल्लू के लिए उसकी मुर्रा नस्ल की भैंस धन की देवी से कम नहीं है। बिल्लू की मुर्रा नस्ल की भैंस एक दिन में 30 लीटर दूध देने का चमत्कार करके दिखा रही है। हरियाणा के अंबाला क्षेत्र के साहा गाँव में रहने वाले रविन्द्र कुमार उर्फ बिल्लू की मुर्रा नस्ल की भैंस की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है। यूट्यूब पर तो बिल्लू की मुर्रा नस्ल की भैंस की धूम मची हुई है।

प्रतियोगिता में जीत ली बुलेट मोटरसाइकिल 

हरियाणा के कुरूक्षेत्र में भैंसों की एक प्रतियोगिता आयोजित की गई। बिल्लू की मुर्रा भैंस ने 29.650 किलो दूध देकर कुरुक्षेत्र की प्रतियोगिता में बुलेट गाड़ी जीत ली। इससे पहले भी ये भैंस दो प्राइज जीत चुकी है। एक साल में ये उसका तीसरा प्राइज है। इससे पहले उसने एक प्रतियोगिता में ट्रैक्टर जीता था और एक बार दो लाख का इनाम जीता था।  रवींद्र कुमार (बिल्लू) पढ़े-लिखे कम हैं, लेकिन बचपन से ही उन्हें पशुओं के साथ लगाव रहा है। भैंसों के साथ-साथ उन्होंने गाय और बकरी भी रखी है। बिल्लू कहते है कि उन्हें इन सभी का बहुत शौक है। प्राइज जीतकर उन्हें बहुत अच्छा लगा है और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है। बिल्लू ने अपने बच्चों को भी इसी काम में लगा दिया है। हालांकि, उनके रिश्तेदार कहते हैं कि बच्चों को विदेश क्यों नहीं भेजते। इसके जवाब में उनका कहना है कि विदेश भेजने से अच्छा है कि यहीं पर अगर अच्छा व्यवसाय करते हैं तो अच्छी खासी इनकम हो सकती है।

बेहद अनोखी है बिल्लू की मुर्रा भैंस 

बिल्लू की मुर्रा भैंस सुंदरा ने हाल ही में कुरुक्षेत्र में DFA डेयरी फार्म एसोसिएशन हरियाणा के पशु मेले में 29.650 किलोग्राम (लगभग 29.65 लीटर) दूध एक दिन में देकर पहला स्थान हासिल किया। ये उपलब्धि काफी बड़ी है क्योंकि मुर्रा भैंस का औसत दूध 10-18 लीटर होता है, और 25 लीटर से ज्यादा दूध देने वाली भैंसें ही चैंपियन मानी जाती हैं। 29.65 किलो वाला रिकॉर्ड हरियाणा के टॉप लेवल कॉम्पिटिशन में भी बेहद शानदार है। बिल्लू हरियाणा के जाने-माने मुर्रा ब्रीडर हैं। उनकी फार्म पर कई सुपर क्वालिटी मुर्रा भैंसें हैं, जिनके मिल्किंग वीडियो पर यूट्यूब में लाखों व्यूज हैं। Murrah buffalo

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Dashrath Manjhi: एक ऐसा शख्स जिसने तोड़ा पहाड़ का गुरूर, कॉमन मैन से बने माउंटेन मैन

Dashrath Manjhi: आज दशरथ मांझी को कौन नहीं जानता। हर मेहनती स्टूडेंट के दिल में दशरथ मांझी बसे हुए हैं। माउंटेन मैन कहे जाने वाले दशरथ मांझी ने अपनी जिद और मेहनत से बिहार के गेहलौर गांव के बीच पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। चलिए जानते हैं उनकी अनसुनी कहानी।

Mountain Man Dashrath Manjhi
दशरथ मांझी की कहानी
locationभारत
userअसमीना
calendar14 Jan 2026 12:53 PM
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हर किसी की जिंदगी में ऐसी घटनाएं जरूर होती है जो पूरी दिशा बदल देती हैं। कुछ लोग मुश्किलों के सामने हार मान लेते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो संघर्ष को चुनौती समझकर अपने रास्ते खुद बनाते हैं। दशरथ मांझी ऐसे ही इंसान थे। बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर में जन्मे यह साधारण मजदूर अपनी जिंदगी में कभी भी असंभव को स्वीकार नहीं कर सके और बन गए माउंटेन मैन।

कौन थे दशरथ मांझी?

“माउंटेन मैन” के नाम से मशहूर दशरथ मांझी बिहार के गया जिले के छोटे से गांव गेहलौर के एक साधारण मजदूर थे। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती। उन्होंने 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद अपने गांव के लिए पहाड़ को काटकर एक रास्ता बनाया जिससे गांव और अस्पताल की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर सिर्फ 15 किलोमीटर हो गई।

पत्नी से थी बेइंतहा मोहब्बत

दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 को हुआ था। 1959 में उनकी पत्नी फल्गुनी देवी खाना लेकर जा रही थीं लेकिन रास्ते में उनका पैर फिसल गया और वह गहरी खाई में गिर गईं। अस्पताल तक पहुंचने में समय ज्यादा लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने दशरथ को ठान लिया कि वह अपने गांव के लोगों के लिए इस पहाड़ को काटकर रास्ता बनाएंगे।

शुरूआत में लोग कहते थे पागल

1960 में दशरथ मांझी ने काम शुरू किया। लोग उन्हें पागल कहने लगे क्योंकि यह काम बहुत मुश्किल था। 1600 साल पुरानी चट्टानों को केवल हथौड़ा और छेनी से काटना आसान नहीं था। उन्होंने दिन भर खेतों में काम किया और शाम से रात तक पहाड़ काटते रहे। कभी-कभी चट्टानें बहुत सख्त होने पर उन्होंने उन्हें गर्म करके फोड़ते। उनके हाथ छिलते और पैर जख्मी होते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

22 साल बाद मिली सफलता

1982 तक दशरथ मांझी ने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया। इस रास्ते से गांव के लोगों को अस्पताल और बाजार तक पहुंचने में आसानी हुई। उनका यह काम दिखाता है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।

दशरथ मांझी की कहानी हमें यह सिखाती है कि कड़ी मेहनत, जिद और धैर्य से किसी भी मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है। उनके प्रयास ने न केवल अपने गांव के लोगों की जिंदगी बदली बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई।

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