भारत–ईरान रिश्तों का इतिहास: मुगल काल से जुड़ा खास नाता

ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार उग्र होते जा रहे हैं। राजधानी तेहरान में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। कई सरकारी दफ्तरों में आगजनी, तोड़फोड़ और कब्जे की खबरें सामने आई हैं।

Mughal art and literature
मुगल कला और साहित्य पर फारसी असर (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Jan 2026 04:59 PM
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बता दें कि प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पें हुई हैं। हालात को काबू में रखने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं और भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। इसी बीच जब ईरान एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है, तो यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि भारत के इतिहास में ईरान की क्या भूमिका रही है। खासकर मुगल काल में ईरान सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि शाही जरूरतों और संस्कृति का अहम केंद्र था।

मुगल और ईरान के रिश्ते क्यों थे खास?

बता दें कि मुगल साम्राज्य और ईरान के संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी थे। बाबर मध्य एशिया की परंपराओं से आए थे, जहां फारसी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। सत्ता संघर्ष के दौरान हुमायूं को ईरान के शाह तहमास्प से सैन्य और राजनीतिक मदद मिली थी। इसी कारण मुगल दरबार में फारसी भाषा, पहनावा, कला और प्रशासनिक प्रणाली को विशेष स्थान मिला। धीरे-धीरे ईरान मुगल साम्राज्य की शाही जरूरतों का एक प्रमुख स्रोत बन गया।

ईरान की शराब और अफीम: शाही शौक का प्रतीक

ईरान की शराब उस दौर में अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थी। मुगल बादशाह जहांगीर को खास तौर पर फारसी शराब और अफीम का शौकीन माना जाता है। दरबार में इन चीजों को केवल नशे की वस्तु नहीं, बल्कि शाही रुतबे और विदेशी संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता था। लंबी दूरी, सुरक्षा व्यवस्था और विशेष पैकिंग के कारण यह शराब बेहद महंगी पड़ती थी, जिसे केवल शाही खजाना ही वहन कर सकता था।

अफीम: नशा नहीं, दवा भी

बाबर से लेकर जहांगीर तक कई मुगल शासक अफीम का सेवन करते थे। उस समय इसे सीमित मात्रा में औषधि और आराम देने वाले पदार्थ के रूप में भी देखा जाता था। उच्च गुणवत्ता वाली अफीम ईरान और मध्य एशिया से मंगवाई जाती थी, जिसे ऊंटों के कारवां के जरिए भारत लाया जाता था। महीनों की यात्रा, सुरक्षा खर्च और रास्ते के कर इसे एक महंगा आयात बनाते थे।

फारसी रेशम और कालीन: मुगल शान की पहचान

ईरान के रेशम और कालीन मुगल दरबार की शान माने जाते थे। फारसी कालीन अपनी बारीक कारीगरी, गहरे रंगों और जटिल डिज़ाइनों के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। इन्हें शाही महलों, दरबारों और विशिष्ट अतिथियों के स्वागत में इस्तेमाल किया जाता था। रेशमी वस्त्र शाही पोशाकों और राजनयिक उपहारों के लिए मंगवाए जाते थे, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक थे।

ईरान से कलाकार, कवि और विद्वान भी आते थे

मुगल और ईरान का संबंध केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं था। फारसी कवि, चित्रकार, संगीतकार, प्रशासक और चिकित्सक भी मुगल दरबार का हिस्सा बने। अकबर के दरबार में हकीम हमाम जैसे ईरानी चिकित्सक थे, जो यूनानी चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ थे। मुगल मिनिएचर पेंटिंग, शायरी और इतिहास लेखन पर फारसी प्रभाव साफ नजर आता है।

फल, मेवे और घोड़े भी थे अहम आयात

मुगल बादशाह ईरान और आसपास के इलाकों से अंगूर, सेब, बादाम, पिस्ता जैसे फल और मेवे मंगवाते थे, जो उस समय भारत में दुर्लभ माने जाते थे। इसके अलावा ऊंची नस्ल के घोड़े ईरान और मध्य एशिया से आयात किए जाते थे, जो सेना और शाही सवारी दोनों के लिए जरूरी थे। घोड़ों का आयात रणनीतिक महत्व और शाही प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ था।

कितना आता था खर्च?

हालांकि उस दौर के सटीक आर्थिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि इन वस्तुओं की दुर्लभता, लंबी दूरी की यात्रा, व्यापारियों की फीस, सुरक्षा खर्च और रास्ते के करों के कारण यह आयात बेहद महंगा होता था। यह सारा खर्च शाही खजाने से किया जाता था, जिसकी आय मुख्य रूप से कृषि कर और व्यापार से होती थी।

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बेजुबान जानवरों के साथ क्रूरता का सनसनीखेज मामला

सूचना के आधार पर तेलंगाना पुलिस ने जब CNK इम्पोर्ट तथा एक्सपोर्ट कंपनी के ऊपर छापा मारा तो वहां का नजारा देखकर पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ गए। उस कंपनी में बड़ी मात्रा में संरक्षित खून के कंटेनर रखे हुए थे, जो बाहर भेजे जाने के लिए तैयार थे।

हैदराबाद में खून के काले कारोबार का खुलासा
हैदराबाद में खून के काले कारोबार का खुलासा
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar09 Jan 2026 02:50 PM
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Hyderabad blood black market : यह खबर आपको अंदर तक हिलाने वाली है। यह खबर इस बात का भी प्रमाण है कि कोई इंसान अपने फायदे के लिए कितने नीचे तक गिर सकता है। इस मामले में जीवित बेजुबान जानवरों के शरीर में से जबरन खून निकालकर उस खून की सप्लाई इंसानों के खून में मिलाकर की जा रही थी। यह मामला पढ़े-लिखे लोगों के शहर हैदराबाद का है। तेलंगाना प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में खून का कारोबार करने वाला खतरनाक गिरोह पकड़ा गया है।

तेलंगाना पुलिस ने किया बहुत बड़ा खुलासा

यह पूरा मामला तेलंगाना प्रदेश की राजधानी हैदराबाद का है। हैदराबाद में तेलंगाना पुलिस को खबर मिली थी कि हैदराबाद के काचेगुड़ा क्षेत्र में CNK इम्पोर्ट तथा एक्सपोर्ट कंपनी में खून का काला कारोबार चल रहा है। सूचना के आधार पर तेलंगाना पुलिस ने जब CNK इम्पोर्ट तथा एक्सपोर्ट कंपनी के ऊपर छापा मारा तो वहां का नजारा देखकर पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ गए। उस कंपनी में बड़ी मात्रा में संरक्षित खून के कंटेनर रखे हुए थे, जो बाहर भेजे जाने के लिए तैयार थे। छापेमारी में मौके से लगभग 1,000 लीटर भेड़ और बकरी का खून बरामद हुआ है। 

तेलंगाना से हरियाणा तक फैला है लाल खून का काला कारोबार

खून का रंग लाल होता है। लाल खून के काला धंधा तेलंगाना से लेकर हरियाणा तक फैला हुआ है।  आरोप है कि जीवित जानवरों से रक्त एकत्र कर हरियाणा स्थित एक फर्म को भेजा जा रहा था। जांच में यह खुलासा हुआ कि खून किसी वधशाला से नहीं, बल्कि जीवित जानवरों से निकाला जा रहा था। पशु कल्याण कानूनों के तहत यह एक गंभीर अपराध और बेहद कू्रर कृत्य है। अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में पशु शोषण और अवैध बायोमेडिकल सप्लाई चेन का यह सबसे बड़ा मामला है। जांचकर्ताओं ने पाया कि इस खून को हरियाणा की एक फर्म में भेजा जा रहा था। हालांकि, इस खून का अंतिम उपयोग क्या था, इस पर अभी रहस्य बना हुआ है। आशंका जताई जा रही है कि इसका उपयोग अवैध क्लीनिकल ट्रायल में किया जा रहा था। अनाधिकृत चिकित्सा अनुसंधान में इसे एक सस्ते विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

खून का कारोबार करने वाली कंपनी का मालिक फरार

छापेमारी के बाद से ' CNK इम्पोर्ट एंड एक्सपोर्ट' का मालिक निकेश फरार है। पुलिस ने उसके खिलाफ पशु क्रूरता, अवैध व्यापार और बायोमेडिकल नियमों के उल्लंघन की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। जब्त किए गए खून के नमूनों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। खून के काले कारोबार का यह पूरा मामला तेलंगाना से लेकर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर बवाल मचा हुआ है। चारों तरफ इस मामले की चर्चा हो रही है। Hyderabad blood black market

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प्रशांत किशोर की कम्पनी है राजनीति में बवाल मचाने वाली IPAC

राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की इसी कंपनी IPAC ने भारत की राजनीति में बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया है। भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में IPAC के दफ्तरों पर बड़ी छापेमारी की है।

I-PAC पर ED कार्रवाई के बाद देशभर में चर्चा तेज
राजनीतिक रणनीति फर्म I-PAC पर ED कार्रवाई के बाद देशभर में चर्चा तेज
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar09 Jan 2026 02:12 PM
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Prashant Kishore : राजनीतिक कंसलटेंट फर्म IPAC के कारण राजनीति में बड़ा बवाल मचा हुआ है। पश्चिम बंगाल से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक IPAC की खूब चर्चा हो रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह कंपनी IPAC प्रशांत किशोर की मूल कंपनी है। राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की इसी कंपनी IPAC ने भारत की राजनीति में बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया है। भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में IPAC के दफ्तरों पर बड़ी छापेमारी की है।

प्रशांत किशोर की कंपनी IPAC का इतिहास लम्बा है

प्रशांत किशोर की कंपनी IPAC का इतिहास लम्बा है। IPAC के इतिहास को समझने से पहले प्रशांत किशोर के विषय में बताना जरूरी है। प्रशांत किशोर वर्तमान में बिहार प्रदेश के राजनेता हैं। प्रशांत किशोर की राजनीतिक पार्टी का नाम जन सुराज पार्टी है। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी ने बिहार विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में प्रशांत किशोर की करारी हार हुई है। इससे पहले प्रशांत किशोर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर देश के अनेक राजनेताओं तथा राजनीतिक दलों को चुनाव जितवाने का बड़ा काम किया था।

वर्ष-2013 में प्रशांत किशोर ने डाली थी IPAC की नींव

अब बात करते हैं राजनीति में बवाल मचाने वाली IPAC फर्म की। आपको बता दें कि 8 साल पहले वर्ष-2013 में प्रशांत किशोर ने पॉलिटिक्स कंसलटेंट फर्म के रूप में IPAC फर्म की नींव डाली थी। इस फर्म IPAC की नींव प्रशांत किशोर ने अपने तीन साथियों प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह तथा विनेश चंदेल के साथ मिलकर डाली थी. शुरुआत में IPAC फर्म नाम सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस था, जो बाद में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के रूप में जानी जाने लगी. इस कंपनी का मकसद राजनीतिक दलों और नेताओं को चुनावी रणनीति, संगठन मजबूत करने और डेटा आधारित फैसलों में मदद करना है. आईपैक के जरिये ही प्रशांत किशोर ने 2014 में नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रचार-प्रसार का जिम्मा लिया था. इसके बाद बिहार चुनावों में नीतीश कुमार, पंजाब में अमरिंदर सिंह और आंध्र प्रदेश वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के लिए भी प्रशांत किशोर की कंपनी ने काम किया था. इसके बाद से आईपैक पश्चिम बंगाल की सीएम ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करती है. दावा किया जाता है कि 2021 में प्रशांत किशोर ने आधिकारिक रूप से इस कंपनी को छोड़ दिया था. इसके बाद से ऋषि राज सिंह, विनेश चंदेल और प्रतीक जैन कंपनी के डायरेक्टर बन गए.

बहुत मोटी कमाई करती है IPAC फर्म 

इस फर्म का कमाई का सबसे बड़ा जरिया राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के लिए की जाने वाली कंसल्टेंसी है. यह कंपनी चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान पार्टियों को पूरी रणनीति देती है. इसमें उम्मीदवार चयन, जमीनी सर्वे, वोटर डेटा एनालिसिस, प्रचार रणनीति, सोशल मीडिया कैंपेन और मैसेजिंग तक शामिल होता है. राजनीतिक दल आईपैक को इसके लिए मोटी फीस देते हैं, जो प्रोजेक्ट और चुनाव के स्तर के हिसाब से तय होती है. IPAC फर्म एक प्राइवेट पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म है, इसलिए इसकी सटीक नेटवर्थ सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बड़े चुनावी प्रोजेक्ट्स और लगातार बढ़ते काम को देखते हुए कंपनी की वैल्यू हजारों करोड़ों रुपये में आंकी जाती है. देश के बड़े राज्यों में चुनावी कैंपेन संभालने और लंबे समय तक पार्टियों के साथ काम करने से IPAC की कमाई और प्रभाव दोनों लगातार बढ़े है.

क्यों मचा हुआ है IPAC को लेकर राजनीतिक बवाल

आपको बता दें कि बृहस्पतिवार 8 जनवरी 2026 को हजारों करोड़ रुपये के कोयला घोटाले में प्रवर्तन निर्देशालय (ईडी) ने तृणमूल कांग्रेस आईटी सेल के प्रमुख प्रतीक जैन के घर तथा प्रशांत किशोर की कंपनी IPAC के दफ्तर  पर छापा मारा। मनी लॉन्ड्रिंग में 12 घंटे चली कार्रवाई के दौरान प. बंगाल की सीएम और तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी आई-पैक के निदेशक जैन के घर पहुंच गई और फाइल लेकर निकल गई। इसके बाद सियासी विवाद बढ़ गया। ममता ने आरोप लगाया कि ईडी पार्टी के आंतरिक दस्तावेज, हार्डडिस्क और संवेदनशील डिजिटल डाटा जब्त कर रही है। उन्होंने ईडी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही है। उनकी पार्टी शुक्रवार को विरोध रैली भी निकालेगी। वहीं, ईडी ने कहा कि किसी पार्टी कार्यालय की तलाशी में बाधा डाली और दस्तावेज जबरन नहीं ली गई। सीएम ममता ने कार्रवाई उठा ले गई। 

कोलकाता हाईकोर्ट में पहुंच गया है IPAC फर्म का मामला

इस पूरे प्रकरण को लेकर ED  कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची है। कार्रवाई के विरोध में तृणमूल कांग्रेस ने भी हाईकोर्ट से केंद्र सरकार के खिलाफ मामला दर्ज कराने की अनुमति मांगी, जिस पर जस्टिस शुभ्रा घोष ने याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है। मामले की सुनवाई शुक्रवार को होने की संभावना है। आई-पैक भी हाईकोर्ट ईडी में तलाशी की वैधता को चुनौती देगी। ने बृहस्पतिवार सुबह दिल्ली में 4 और बंगाल में 6 ठिकानों पर छापे मारे। इनमें कोलकाता में आई-पैक का कार्यालय और जैन का घर भी है। सूत्रों के अनुसार, जैन के खिलाफ घोटाले से जुड़े हवाला लेनदेन व नकदी डील के खास सबूत मिले हैं। मामला नवंबर, 2020 में सीबीआई की एफआईआर जुड़ा है। इस मामले में ईडी ममता भतीजे व सांसद अभिषेक बनर्जी से अवैध कोयला व्यापार से मिले फंड के पूछताछ कर चुकी है। दावा है कि से के बनर्जी भी लाभार्थी थे। Prashant Kishore



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