भगवान श्रीनाथ जी के आर्शीवाद से मालामाल हैं मुकेश अंबानी का परिवार
भारत
चेतना मंच
01 Sep 2025 04:29 PM
मुकेश अंबानी तथा उनके परिवार की चर्चा केवल भारत में ही नहीं होती है बल्कि मुकेश अंबानी दुनिया के सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति हैं। मुकेश अंबानी भारत के सबसे बड़े पूंजीपति हैं। बहुत सारे लोग नहीं जानते कि मुकेश अंबानी तथा उनके पूरे परिवार के ऊपर भगवान श्रीनाथ जी की अपार कृपा है। भगवान श्रीनाथ जी की कृपा से ही मुकेश अंबानी का परिवार अधिक से अधिक मालामाल होता चला जा रहा है। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji
मुकेश अंबानी का परिवार करता है भगवान श्रीनाथ जी की पूजा
मुकेश अंबानी के पिता धीरू भाई अंबानी बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे। धर्म के प्रति श्रद्धा के कारण ही मुकेश अंबानी का परिवार खूब पूजा पाठ करता है। मुकेश अंबानी के परिवार को अनेक मौकों पर पूजा-पाठ करते हुए देखा जा सकता है। तमाम देवी-देवताओं को मानने वाले मुकेश अंबानी के परिवार के ईष्ट देव भगवान श्रीनाथ जी हैं। भगवान श्रीनाथ जी कृपा से मुकेश अंबानी का परिवार करोड़पति से अरबपति तथा अरबपति से खरबपति बनता चला जा रहा है। मुकेश अंबानी ने एक इंटरव्यू में खुद स्वीकार किया है कि उनके परिवार के इष्टदेव भगवान श्रीनाथ जी हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीनाथ जी की अंबानी परिवार के ऊपर अपार कृपा है।
भगवान श्रीनाथ जी का इतिहास बहुत ही पुराना है
मुकेश अंबानी का परिवार जिन भगवान श्रीनाथ जी का पुजारी है। उन भगवान श्रीनाथ जी के विषय में जान लेना जरूरी है। भगवान श्रीनाथ जी को भगवान श्रीकृष्ण का ही दूसरा स्वरूप माना जाता है। भगवान श्रीनाथ जी भगवान श्रीकृष्ण के उस बाल रूप में पूजे जाते हैं जिस बाल रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्द्र देवता के घमण्ड को चकनाचूर कर दिया था। भगवान श्रीनाथ जी का मुख्य मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा में स्थापित है। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji
भगवान श्रीनाथ जी के नाथद्वारा मंदिर का इतिहास
भगवान श्रीनाथ जी को मानने वाले भक्त बताते हैं कि राजस्थान में बनास नदी के किनारे नाथद्वारा में ऐसा ही एक तीर्थ स्थल है। इस प्रमुख वैष्णव तीर्थस्थल पर श्रीनाथजी मंदिर में भगवान कृष्ण सात वर्षीय ‘शिशु’ अवतार के रूप में विराजित हैं। नाथद्वारा में स्थापित भगवान श्रीनाथजी के विग्रह को मूलरूप से भगवान कृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है। राजसमंद जिले में स्थित नाथद्वारा के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध है। यह शहर अरावली पर्वतमाला के पास में स्थित है और बनास नदी के किनारे पर बसा हुआ है। नाथद्वारा, उदयपुर से मात्र 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नाथद्वारा, भगवान श्रीनाथजी के मंदिर की वजह से देश—विदेश में प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji
मुगल शासक औरंगजेब मूर्ति पूजा का विरोधी था। इसलिए उसने अपने शासनकाल में मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए। अनेक मंदिरों की तोडफ़ोड़ के साथ मथुरा जिले में स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर को तोडऩे का काम भी शुरू हो गया। इससे पहले कि श्रीनाथ जी की मूर्ति को कोई क्षति पहुंचे, मंदिर के पुजारी दामोदर दास बैरागी मूर्ति को मंदिर से बाहर निकाल लाए। दामोदर दास वल्लभ संप्रदाय के थे और वल्लभाचार्य के वंशज थे। उन्होंने बैलगाड़ी में श्रीनाथजी की मूर्ति को रखा और उसके बाद कई राजाओं से आग्रह किया कि श्रीनाथ जी का मंदिर बनाकर उसमें मूर्ति स्थापित करा दें, लेकिन औरंगजेब के डर से किसी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji
अंत में दामोदर दास बैरागी ने मेवाड़ के राजा राणा राजसिंह के पास संदेश भिजवाया, क्योंकि राणा राजसिंह पहले भी औरंगजेब को चुनौती दे चुके थे। यह बात 1660 की है। जब किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से विवाह करने का प्रस्ताव औरंगजेब ने भेजा तो चारुमती ने साफ इनकार कर दिया। तब रातों-रात राणा राजसिंह को संदेश भिजवाया गया। राणा राजसिंह ने बिना कोई देरी किए चारुमती से किशनगढ़ में विवाह किया। औरंगजेब इससे राणा राजसिंह को अपना शत्रु मानने लगा। यह दूसरा मौका था जब राणा राजसिंह ने खुलकर औरंगजेब को चुनौती दी और कहा कि उनके रहते हुए बैलगाड़ी में रखी श्रीनाथजी की मूर्ति को कोई छू तक नहीं पाएगा। मंदिर तक पहुंचने से पहले औरंगजेब को एक लाख राजपूतों से निपटना होगा। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji
राजस्थान प्रदेश में कोटा के पास रखी हैं श्रीनाथजी की पादुकाएं
आपको बता दें कि उस समय श्रीनाथजी की मूर्ति बैलगाड़ी में राजस्थान के जोधपुर के पास चौपासनी गांव में थी और चौपासनी गांव में कई महीने तक बैलगाड़ी में ही श्रीनाथजी की मूर्ति की उपासना होती रही। यह चौपासनी गांव अब जोधपुर का हिस्सा बन चुका है और जिस स्थान पर यह बैलगाड़ी खड़ी थी, वहां आज श्रीनाथजी का एक मंदिर बनाया गया है। बताते चलें कि कोटा से 10 किमी दूर श्रीनाथजी की चरण पादुकाएं उसी समय से आज तक रखी हुई हैं, उस स्थान को चरण चौकी के नाम से जाना जाता है। बाद में चौपासनी से मूर्ति को सिहाड़ लाया गया। दिसंबर 1671 कोसिहाड़ गांव में श्रीनाथ जी की मूर्तियों का स्वागत करने के लिए राणा राजसिंह स्वयं गांव गए। यह सिहाड़ गांव उदयपुर से 30 मील एवं जोधपुर से लगभग 140 मील की दूरी पर स्थित है जिसे आज हम नाथद्वारा के नाम से जानते हैं। फरवरी 1672 को मंदिर का निर्माण संपूर्ण हुआ और श्री नाथ जी की मूर्ति मंदिर में स्थापित कर दी गई। Mukesh Ambani's Bhagwan Shrinathji