कोरियन ड्रामा का असर : छात्रों में क्रेज, इंजीनियरिंग की छात्रा हुई शिकार
रोमांटिक कहानियां, भावनात्मक संवाद, परफेक्ट लुक्स और अलग जीवनशैली युवाओं को अपनी ओर खींचती है। हाल ही में गोरखपुर की एक इंजीनियरिंग छात्रा से जुड़ा मामला इसी बदलते ट्रेंड पर बहस की वजह बना है।

korean-Dramas : पिछले कुछ वर्षों में भारत के युवाओं, खासकर कॉलेज छात्रों के बीच कोरियन ड्रामा और के-पॉप का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। रोमांटिक कहानियां, भावनात्मक संवाद, परफेक्ट लुक्स और अलग जीवनशैली युवाओं को अपनी ओर खींचती है। हाल ही में गोरखपुर की एक इंजीनियरिंग छात्रा से जुड़ा मामला इसी बदलते ट्रेंड पर बहस की वजह बना है।
जब मनोरंजन आदत बन जाए
बताया गया कि छात्रा रोजाना कई घंटे कोरियन ड्रामा और फिल्में देखने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी बोलचाल में विदेशी शब्द आने लगे, पहनावे और मेकअप में भी बदलाव दिखने लगा। यह सब अपने आप में असामान्य नहीं है, क्योंकि युवा अवस्था में लोग नई पहचान तलाशते हैं और पसंदीदा किरदारों से प्रभावित होना स्वाभाविक है। समस्या तब सामने आई जब यह रुचि पढ़ाई और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों पर भारी पड़ने लगी। परीक्षा में अंक गिरने लगे और परिवार को चिंता हुई, जिसके बाद काउंसलिंग की जरूरत महसूस की गई।
प्रभाव और लत के बीच की रेखा
किसी संस्कृति, भाषा या कला से प्रभावित होना गलत नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने बिताने लगे, नींद, पढ़ाई और सामाजिक जीवन प्रभावित होने लगे, तब यह एक चेतावनी बन जाती है। यही फर्क है रुचि और लत के बीच। कोरियन ड्रामा हो या आॅनलाइन गेम ये केवल माध्यम हैं। असल चुनौती है बढ़ता स्क्रीन टाइम, भावनात्मक अकेलापन और युवाओं के पास सीमित रचनात्मक विकल्प।
सिर्फ कंटेंट को दोष देना आसान है
अक्सर ऐसी घटनाओं में सारा दोष विदेशी कंटेंट या मोबाइल फोन पर डाल दिया जाता है। लेकिन यह एकतरफा सोच है। अगर संवाद, मार्गदर्शन और संतुलन मौजूद हो, तो वही कंटेंट सीखने और मनोरंजन का साधन भी बन सकता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों और युवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय उनसे खुलकर बात करना ज्यादा प्रभावी होता है। समय तय करना, दिनचर्या बनाना और खेल, संगीत या किताबों जैसे विकल्प देना व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
माता-पिता और संस्थानों की भूमिका
परिवार और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समय रहते बदलावों को समझें। चिड़चिड़ापन, अकेलापन या पढ़ाई में लगातार गिरावट जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर काउंसलर या विशेषज्ञ की मदद लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। कोरियन ड्रामा या किसी भी विदेशी संस्कृति से प्रभावित होना न तो अपराध है और न ही मानसिक समस्या। असली सवाल है संतुलन का। जब मनोरंजन जीवन को नियंत्रित करने लगे, तब हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। युवाओं को समझ, समर्थन और सही दिशा मिले तो क्रेज कभी पागलपन नहीं बनता।
korean-Dramas : पिछले कुछ वर्षों में भारत के युवाओं, खासकर कॉलेज छात्रों के बीच कोरियन ड्रामा और के-पॉप का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। रोमांटिक कहानियां, भावनात्मक संवाद, परफेक्ट लुक्स और अलग जीवनशैली युवाओं को अपनी ओर खींचती है। हाल ही में गोरखपुर की एक इंजीनियरिंग छात्रा से जुड़ा मामला इसी बदलते ट्रेंड पर बहस की वजह बना है।
जब मनोरंजन आदत बन जाए
बताया गया कि छात्रा रोजाना कई घंटे कोरियन ड्रामा और फिल्में देखने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी बोलचाल में विदेशी शब्द आने लगे, पहनावे और मेकअप में भी बदलाव दिखने लगा। यह सब अपने आप में असामान्य नहीं है, क्योंकि युवा अवस्था में लोग नई पहचान तलाशते हैं और पसंदीदा किरदारों से प्रभावित होना स्वाभाविक है। समस्या तब सामने आई जब यह रुचि पढ़ाई और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों पर भारी पड़ने लगी। परीक्षा में अंक गिरने लगे और परिवार को चिंता हुई, जिसके बाद काउंसलिंग की जरूरत महसूस की गई।
प्रभाव और लत के बीच की रेखा
किसी संस्कृति, भाषा या कला से प्रभावित होना गलत नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने बिताने लगे, नींद, पढ़ाई और सामाजिक जीवन प्रभावित होने लगे, तब यह एक चेतावनी बन जाती है। यही फर्क है रुचि और लत के बीच। कोरियन ड्रामा हो या आॅनलाइन गेम ये केवल माध्यम हैं। असल चुनौती है बढ़ता स्क्रीन टाइम, भावनात्मक अकेलापन और युवाओं के पास सीमित रचनात्मक विकल्प।
सिर्फ कंटेंट को दोष देना आसान है
अक्सर ऐसी घटनाओं में सारा दोष विदेशी कंटेंट या मोबाइल फोन पर डाल दिया जाता है। लेकिन यह एकतरफा सोच है। अगर संवाद, मार्गदर्शन और संतुलन मौजूद हो, तो वही कंटेंट सीखने और मनोरंजन का साधन भी बन सकता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों और युवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय उनसे खुलकर बात करना ज्यादा प्रभावी होता है। समय तय करना, दिनचर्या बनाना और खेल, संगीत या किताबों जैसे विकल्प देना व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
माता-पिता और संस्थानों की भूमिका
परिवार और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समय रहते बदलावों को समझें। चिड़चिड़ापन, अकेलापन या पढ़ाई में लगातार गिरावट जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर काउंसलर या विशेषज्ञ की मदद लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है। कोरियन ड्रामा या किसी भी विदेशी संस्कृति से प्रभावित होना न तो अपराध है और न ही मानसिक समस्या। असली सवाल है संतुलन का। जब मनोरंजन जीवन को नियंत्रित करने लगे, तब हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। युवाओं को समझ, समर्थन और सही दिशा मिले तो क्रेज कभी पागलपन नहीं बनता।












