मकर संक्रांति कोई साधारण त्यौहार नहीं है, यह है बहुत खास

होली तथा दीपावली जैसे बड़े त्यौहार भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में एक ही नाम से मनते हैं। मकर संक्रांति के त्यौहार के विषय में एक ही नाम से त्यौहार मनाने की परम्परा बदल जाती है।

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 06:04 PM
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Makar Sankranti : मकर संक्रांति भारत का कोई साधारण त्यौहार नहीं है। मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे भारत का उत्सव है। यह भी कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति का पर्व भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ पर्व है। भारत में जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें से ज्यादातर त्यौहार एक ही नाम से मनाए जाते हैं। होली तथा दीपावली जैसे बड़े त्यौहार भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में एक ही नाम से मनते हैं। मकर संक्रांति के त्यौहार के विषय में एक ही नाम से त्यौहार मनाने की परम्परा बदल जाती है।

मकर संक्रांति के रखे गए हैं अनेक नाम

भारत के अलग-अलग भागों में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग नाम से मनाया जाता है खिचड़ी पर्व, पोंगल, बिहू, लोहड़ी तथा संक्रांत नाम से मनाए जाने वाले सभी पर्व वास्तव में मकर संक्रांति के ही प्रतीक हैं। भारत के तमाम पर्व प्रकृति को समर्पित करके मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति का पर्व भी पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित पर्व है। मकर संक्रांति के मूल में सूर्य उपासना, नदी में स्नान तथा दान करने की प्रक्रिया पूरे भारत में एक समान है।

भारत की हर संस्कृति में मौजूद है मकर संक्रांति

भारत अनेक प्रकार की संस्कृतियों का देश है। मकर संक्रांति भारत की हर संस्कृति में है और कश्मीर से कन्याकुमारी और बंगाल से गुजरात तक इसकी मान्यता है। यह पंजाब में लोहड़ी है, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी है, बिहार में संक्रांत हैं. असम में माघ बिहू है तो तमिलनाडु में पोंगल है। संक्रांति से एक दिन पहले हर साल 13 जनवरी को लोहड़ी मनाई जाती है. लोहड़ी सीधे तौर पर अग्नि से जुड़ा त्योहार है। जहां आग पुरानी बुरी यादों, बुरे विचारों और नकारात्मक ताकतों को जला देने की प्रतीक बन जाती है. इस आग में नई फसल के लावे भूने जाते हैं, जो नवीनता को अपनाने का प्रतीक है. लोहड़ी का अर्थ है, लौ (लकड़ी), ओह (उपले) और ड़ी यानी रेवड़ी. लौ जो सकारात्मकता लाती है, उपले जो बीते दिनों के गुजर जाने के प्रतीक हैं और रेवड़ी जो खुशियां लाती हैं. फसलों के घर आने से खुशियां आती हैं और इस खुशी में जुड़ जाती हैं लोककथाएं।

लोहड़ी में भी मिलती है मकर संक्रांति की झलक

लोहड़ी में दुल्ला भट्टी की कहानी गीत बनकर गूंजती है, दुल्ला भट्टी नाम के इस बांके नौजवान ने सत्ता की गलत ताकतों के खिलाफ आवाज उठाई. तब बादशाह अकबर के राज में पंजाब में लड़कियां बेची जा रही थीं. दुल्ला ने उन्हें बचाया और लोहड़ी के दिन उनकी शादी कराई। सामाजिक ताने-बाने में दुल्ला ने ऐसी जगह बनाई कि लोहड़ी की पारंपरिकता में वह हर बार के लिए शामिल हो गया। आज दुल्ला की बातें न हो तो लोहड़ी हो ही नहीं सकती।

उत्तर प्रदेश स​​हित मध्य भारत में खूब मनाई जाती है मकर संक्रांति

ज्योतिष कहता है कि जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है और राशि परिवर्तन करते हुए मकर राशि में पहुंचता है तो इस सूर्य की मकर संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति धरती के अंडाकार परिक्रमा पथ पर चलते हुए सूर्य के निकट पहुंचने का प्रतीक है. ग्रहों की चाल के आधार पर मध्य भारत मकर संक्रांति मनाता है. सूर्य का राशि परिवर्तन, एक राशि से दूसरी राशि में जाना साथ ही पृथ्वी का दिशा परिवर्तन ऐसी खगोलीय घटना है जो कि लोगों के रहन-सहन पर सीधे तौर पर असर डालती है. मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और फिर दान आदि की परंपरा उसी जड़ता को हटा देने का जरिया है. चेतना की और लौटा व्यक्ति जब दोबारा समाज में पहुंचता है तो तिल-गुड़ के लड्डू इसे फिर से समाज में घुलना-जुड़ना सिखाते हैं। त्योहारों की मूल सिद्धांत भी यही है कि वह सामाजिकता को बचाए रखे। राजस्थान में मकर संक्रांति का मतलब है पतंगों से भरा आसमान। जयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में यह दिन रंगों और प्रतिस्पर्धा से भर जाता है। हरियाणा में इसे संक्रांत कहा जाता है और जहां बहुओं द्वारा बुजुर्गों को उपहार देने की परंपरा है।

मकर संक्रांति पर खिचड़ी का बड़ा महत्व

मकर संक्रांति के इस मौके को खिचड़ी भी कहा जाता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में इस दिन खिचड़ी चढ़ाने, दान करने, बनाने और सहभोज करने का बहुत महत्व है। खिचड़ी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण व्यंजन और प्रतीकात्मक भोजन है, जिसका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और पोषण के दृष्टिकोण से है। खिचड़ी विभिन्न सामग्रियों से तैयार की जाती है, जिनमें चावल, दाल, सब्जियां और मसाले शामिल होते हैं। इसे सादगी और संतुलित आहार का प्रतीक माना जाता है। सनातन में इसे साधु भोज, देव अन्न और ऋषिभुक्तम (ऋषियों के भोग लगाने हेतु) कहा गया है।

तमिलनाडु में पोंगल है मकर संक्रांति की झलक

फसलें कटकर घर आ चुकी हैं और उत्साह का माहौल है. फिर जब सूर्य देव आकाश में नजर आते हैं तो तमिल समाज इसे एक नए वर्ष के तौर पर लेता है और पोंगल मनाता है. दरवाजों पर रंग-रोगन आंगन में खूबसूरत पूक्कलम (रंगोली) सजाए गए हैं. गाय-बैलों को नहला-धुला कर सजाया गया है. इस बीच घर की बड़ी-बूढ़ी अलग-अलग मटकों धान को दूध में भिगोकर शक्कर के साथ उबाल रही हैं. वह इसे इतना उबालेंगी कि जब तक यह उफन कर किनारों पर न आ जाए. इसी के साथ उनकी स्थानीय भाषा में एक गीत भी हिलोरे लेता रहेगा. इसका मतलब है कि जैसे सागर का पानी उफन कर तट पर आया है, जैसे मेरी मटकी में उफान आया है, बस मेरे घर के बच्चों में खुशी भी ऐसी उफान पर आए. समृद्धि और साथ-साथ मिलकर हंसने-गाने का यह त्योहार पोंगल है. पोंगल आमतौर पर जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय चार दिनों तक मनाया जाता है. भोगी पोंगल जो सफाई और पुराने सामान और पुराने विचारों को छोड़ने का दिन है. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुराने सामान को जलाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक मानते हैं. दूसरा दिन, थाई पोंगल है जो इसका मुख्य दिन है. लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं और धन्यवाद देते हैं. इस दिन पोंगल नामक विशेष मिठाई पकाई जाती है, जो चावल, दूध और गुड़ से बनाई जाती है। इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है. घरों के आंगन में सुंदर रंगोली (कोलम) बनाई जाती है। मट्टू पोंगल का दिन मवेशियों (गाय और बैल) को समर्पित होता है. मवेशियों को सजाया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं और उन्हें फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं। मवेशियों की पूजा की जाती है क्योंकि वे कृषि कार्यों में मदद करते हैं। फिर आता है कन्नम पोंगल, सूर्य पूजा के साथ कन्याओं को उपहार दिए जाते हैं। यह दिन परिवार और समाज के साथ बिताने के लिए होता है। लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं।

आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना में भी मनाते हैं पर्व

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति तीन दिन मनाई जाती है। भोगी, संक्रांति और कनुमा. गो-पूजा, हरिदासु की टोलियां और रंगोली (मुग्गुलु) इसकी पहचान हैं। वहीं, कर्नाटक में यह पर्व सुग्गी कहलाता है. यहां एलु-बेला (तिल, गुड़) नारियल और मूंगफली का मिश्रण, आपसी सौहार्द का प्रतीक है। केरल में मकर संक्रांति का केंद्र सबरीमला मंदिर है, जहां मकरविलक्कु और मकर ज्योति के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति के दिन उत्तरायणी मनाया जाता है। यह पर्व खासतौर पर गढ़वाली और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों में मनाया जाता है। यहां भी तिल-गुड़ का महत्व है और लोग एक-दूसरे को यह बांटते हैं, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक पकवान है घुघुतिया. ये पकवान मकर संक्रांति की एक लोककथा से जुड़ा हुआ है। यहां छोटे बच्चों को गुड़-आटे-दूध मिलाकर और तलकर बनाई गई घुघुतिया नाम की मिठाई दी जाती है और इसकी माला पिरोकर छोटे बच्चों को पहना दी जाती है। लोककथा में है कि इसी घुघुतिया ने एक बार राजा के बच्चे की न सिर्फ जान बचाई थी बल्कि उत्तराधिकार के बहुत बड़े मसले का हल भी किया था। उत्तरैणी के दिन यहां लोग आटे-गुड़ मिलाकर उसकी माला बनाते हैं और कौवों को खिलाते हैं।

पश्चिम भारत में अलग ही नजारा 

गुजरात में मकर संक्रांति का नाम ही बदल जाता है और यहां यह उत्तरायण कहलाता है। अहमदाबाद से सूरत तक पतंगों का उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। आसमान एक तरीके से सामाजिक एकता का कैनवास बन जाता है। महाराष्ट्र में मकर संक्रांत के लिए कहा जाता है, 'तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला। 'यानी तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो।' यह केवल मिठास का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का संदेश है। महिलाएं हल्दी-कुमकुम के कार्यक्रम आयोजित करती हैं। उधर, गोवा में यह पर्व नदी-स्नान और ग्रामीण मेलों से जुड़ा है. यहां भी तिल-गुड़ और पारंपरिक भोजन का महत्व है।

बिहार में दही-चूड़ा की बहार

सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो बिहार और झारखंड में दही-चूड़ा के भोज का आयोजन किया जाता है। इस वक्त नया धान आया होता है और इससे ही बनता है नर्म-मुलायम चिवड़ा. दही-चूड़ा (चिवड़ा) ऐसा भोजन है जो प्राचीन फास्ट फूड है और नूडल्स से भी तेज बनता है। इसकी शुरुआत कैसे हुई इस पर कोई पौराणिक दावा नहीं किया जा सकता है, लेकिन दंतकथाओं में दर्ज है समुद्र मंथन के समय जब देवता भूख से व्याकुल हुए तब ऋषियों ने तुरंत ही भोजन का प्रबंध करने के लिए दही-चूड़ा का भोजन कराया. शास्त्रों में दही को भी शुभ माना गया है और धान को समृद्धि का प्रतीक. दही-चूड़ा जब मिलकर एक हो जाते हैं तो शुभता और समृद्धि दोनों का प्रभाव पड़ता है। दही हमारे नकारात्मक प्रभाव को हटाता है और चूड़ा या चिवड़ा ऊर्जा देता है।

झारखंड में 'तुसु परब' के रूप में आयोजन

झारखंड में मकर संक्रांति का लोक रूप 'तुसु परब' के रूप में सामने आता है। तुसु गीतों के साथ युवतियां लोक परंपराओं को जीवित रखती हैं। नदी-स्नान और मेले इसका अहम हिस्सा हैं। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह पर्व कृषि से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ में इसे पूस परब कहा जाता है, जहां नई फसल के स्वागत में लोकनृत्य और सामूहिक भोज होते हैं।

गंगा से ब्रह्मपुत्र तक कैसी होती है मकर संक्रांति

पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति को पौष संक्रांति कहा जाता है। यहां गंगासागर मेला इस पर्व का केंद्र बन जाता है जहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। घरों में पिठे-पुली जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं. ओडिशा में यह पर्व मकर चौला के लिए जाना जाता है. सूर्य को अर्पित किए जाने वाले विशेष भोग में कृषि संस्कृति की झलक मिलती है। असम में मकर संक्रांति भोगाली बिहू या माघ बिहू के रूप में मनाई जाती है। यह फसल कटाई के बाद का उत्सव है, जिसमें सामूहिक भोज और मेजी जलाने की परंपरा है. सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में यह पर्व स्थानीय जनजातीय परंपराओं में ढलकर सामने आता है। जहां सूर्य और प्रकृति की आराधना इसका मूल भाव है।

असम में माघ बिहू का उत्साह

असम में माघ बिहू को भोगाली बिहू और माघर दोमाही के नाम से भी जाना जाता है। माघ बिहू से पहले के दिन को उरुका होता है, जो अग्नि देव को समर्पित माना जाता है. इस मौके पर लोक व्यंजन जैसे आलू पितिका, जाक और मसोर टेंगा बनाया जाता है और सब मिलकर भोज करते हैं. इसी के साथ पहली फसल अपने आराध्य देव को अर्पित की जाती है और यह कामना की जाती है कि आने वाले समय में भी अच्छी फसल पैदा हो।

भारत में मकर संक्रांति के अलग अलग नाम

1. उत्तर प्रदेश – खिचड़ी पर्व

2. बिहार – तिल संक्रांति / खिचड़ी / दही चूड़ा

3. झारखंड – तुसु परब

4. मध्य प्रदेश – मकर संक्रांति

5. छत्तीसगढ़ – पुस परब

6. राजस्थान – मकर संक्रांति

7. हरियाणा – संक्रांत

8. पंजाब – लोहड़ी (एक दिन पहले)

9. हिमाचल प्रदेश – माघी

10. उत्तराखंड – घुघुतिया- उत्तरैणी

11. गुजरात – उत्तरायण

12. महाराष्ट्र – मकर संक्रांत

13. गोवा – संक्रांत

14. पश्चिम बंगाल – पौष संक्रांति

15. ओडिशा – मकर  चौला संक्रांति

16. असम – भोगाली बिहू / माघ बिहू

17. सिक्किम – माघे संक्रांति

18. अरुणाचल प्रदेश – माघे संक्रांति

19. नागालैंड – सेक्रेनी (मकर संक्रांति जैसा, पर अलग)

20. मणिपुर – याओसांग के आसपास (संक्रांति पर सूर्य पूजा)

21. मेघालय –  माघीर

22. मिजोरम – संक्रांति

23. त्रिपुरा – पौष संक्रांति

24. आंध्र प्रदेश – भोगी संक्रांति

25. तेलंगाना – कनुमा संक्रांति

26. तमिलनाडु – पोंगल

27. कर्नाटक – सुग्गी / मकर संक्रांति

28. केरल – मकरविलक्कु / मकर ज्योति Makar Sankranti



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खिचड़ी ने बदल दिया था भारत का पुराना इतिहास

दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

खिचड़ी वाली कथा
खिचड़ी वाली कथा
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userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 05:03 PM
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Makar Sankranti Khichdi History : मकर संक्रांति का पर्व खिचड़ी खाने वाले पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। भारत के सभी घरों में खिचड़ी खाई जाती है। खिचड़ी के भोजन को देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोजन माना जाता है। दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि खिचड़ी ने एक बार भारत का पूरा पुराना इतिहास भी बदल दिया था। हम आपको बता रहे हैं कि आखिर खिचड़ी ने भारत का इतिहास कैसे बदल दिया था।

जब खिचड़ी ने कर दिया था बड़ा कमाल

खिचड़ी के द्वारा भारत के इतिहास को बदलने की यह घटना बहुत पुरानी घटना है। यह घटना उस समय की है  जब मगध में नंदवंश का शासन था। नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत कू्रर था। जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया। इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली।  उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया। इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े। चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आंकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।

खिचड़ी खाकर बनी रणनीति ने सब कुछ बदल डाला था

उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे। वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे। वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था। इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे। बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई। थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी। घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं। बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना। चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है। चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया। मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका। चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा। सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। अब आप समझ गए होंगे कि किस प्रकार खिचड़ी ने भारत का इतिहास बदल दिया था। Makar Sankranti Khichdi History

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स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलकर क्या साबित कर रही है सरकार

भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
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userआरपी रघुवंशी
calendar14 Jan 2026 04:14 PM
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Name Change Policy of Modi Government : भारत में स्थानों, सडक़ों, शहरों, सरकारी दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों तथा सरकारी योजनाओं का नाम बदलने का बड़ा अभियान चल रहा है। भारत सरकार ने तो ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने का रिकार्ड ही कायम कर डाला है। भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रचलित नाम को बदलकर सेवा तीर्थ कर दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि नाम बदलने से क्या होगा? भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान का हमने पूरा विश्लेषण किया है।

आपको समझाने के लिए कम शब्दों में पूरा विश्लेषण

भारत सरकार के नाम बदलने वाले अभियान के पीछे क्या सोच है। स्थानों तथा योजनाओं के नाम बदलने के विषय में भारत सरकार की क्या सोच है? नाम बदलने को लेकर विपक्षी दल क्या सोचते हैं? भारत सरकार द्वारा नाम बदलने के अभियान के विषय में भारत के आम नागरिकों की क्या सोच है? इन सभी सवालों के विषय में हमने पूरा विश्लेषण किया है। यह पूरा विश्लेषण हम बेहद कम शब्दों में आप तक पहुंचा रहे हैं।

नाम बदलने की राजनीति या नई प्रशासनिक सोच?

मोदी सरकार की ‘नेम चेंज पॉलिसी’ का गहन विश्लेषण

भारत में स्थानों, इमारतों और संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह प्रक्रिया एक स्पष्ट वैचारिक नीति के रूप में उभर कर सामने आई है। राजपथ से कर्तव्य पथ, रेसकोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग और अब प्रधानमंत्री कार्यालय से सेवा तीर्थ—ये सभी बदलाव केवल नाम नहीं, बल्कि शासन की सोच और दिशा को दर्शाने वाले प्रतीक बन गए हैं।

1. ‘सत्ता’ से ‘सेवा’ की ओर: नामों के पीछे का दर्शन

मोदी सरकार का दावा है कि ये नाम परिवर्तन औपनिवेशिक और शासक-केंद्रित सोच से हटकर लोक-सेवा और कर्तव्य-बोध की भावना को मजबूत करने के लिए किए गए हैं।

        PMO ➝ सेवा तीर्थ

यह संदेश देता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता की सेवा का तीर्थ है।

      राजपथ ➝ कर्तव्य पथ

सत्ता के प्रदर्शन के मार्ग को जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रतीक में बदला गया।

    रेसकोर्स रोड ➝ लोक कल्याण मार्ग

शासक की निजी सुविधा से जनता के कल्याण की प्राथमिकता का संकेत।

👉 विश्लेषण:

यह बदलाव एक तरह से प्रशासनिक शब्दावली को value-driven governance से जोड़ने की कोशिश है।

2. औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का प्रयास

सरकार का तर्क है कि कई नाम ब्रिटिश काल की मानसिकता को दर्शाते थे—


·       राज, पथ, रेसकोर्स, दरबार जैसे शब्द सत्ता और शासक वर्ग को प्राथमिकता देते हैं।


·        नए नामों में लोक, कर्तव्य, सेवा, कल्याण जैसे शब्द शामिल किए गए।


👉 विश्लेषण:

यह प्रक्रिया उसी श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें


·         इंडियागेट के पास नेताजी की प्रतिमा,


·         संसद में लोकतांत्रिक प्रतीकों का पुनर्संयोजन,


·         और नई संसद भवन की अवधारणा शामिल है।


📊 3. क्या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति है?

विपक्ष और आलोचक सवाल उठाते हैं—


·         क्या नाम बदलने से बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे हल होंगे?


·         क्या करोड़ों रुपये खर्च कर नाम बदलना प्राथमिकता होनी चाहिए?


👉 जवाबी विश्लेषण:

समर्थकों का कहना है कि


·         हर समाज को अपने प्रतीकों और नैरेटिव की जरूरत होती है।


·         जैसे संविधान, ध्वज और राष्ट्रगान प्रतीक हैं—वैसे ही सार्वजनिक नाम भी।


नाम बदलना policy execution नहीं, बल्कि policy narrative का हिस्सा है।


🗳️ 4. राजनीतिक लाभ और चुनावी मनोविज्ञान

नाम परिवर्तन की नीति का एक राजनीतिक पक्ष भी है—


·         यह राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना को मजबूत करती है।


·         यह सरकार के कोर वोटबेस को यह संदेश देती है कि “हम पहचान वापस ला रहे हैं।”


👉 विश्लेषण:

यह नीति


·         भावनात्मक जुड़ाव (emotional connect) बनाती है,


·         और सरकार की strong leadership image को पुष्ट करती है।


🏗️ 5. प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार—


·         नई इमारतें, नए नाम और नई संरचनाएं वर्क कल्चर बदलने का प्रयास हैं।


·         ‘कर्तव्य भवन’ या ‘सेवा तीर्थ’ जैसे नाम कर्मचारियों को उनके रोल की याद दिलाते हैं।


👉 विश्लेषण:

हालांकि नाम बदलने से कार्यक्षमता अपने-आप नहीं बढ़ती,

लेकिन यह संस्थागत सोच को प्रभावित जरूर करता है।


🌍 6. अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भारत की छवि

दुनिया के कई देशों में—


·         दक्षिण अफ्रीका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने भी

सत्ता परिवर्तन के बाद नाम और प्रतीक बदले।


👉 विश्लेषण:

भारत भी अब खुद को


·         एक Post-colonial confident nation


·         और civilizational state के रूप में पेश कर रहा है।


🧠 7. जनता क्या सोचती है?

जन-प्रतिक्रिया बंटी हुई है—


✔️ एक वर्ग इसे गर्व और आत्मसम्मान से जोड़ता है

❌ दूसरा वर्ग इसे ध्यान भटकाने की राजनीति मानता है


👉 सच यह है

नाम बदलना न तो चमत्कार है, न ही पूरी तरह निरर्थक—

यह एक वैचारिक संदेश है, जिसका असर समय के साथ आंका जाएगा।


📌 निष्कर्ष: नाम से आगे की यात्रा

मोदी सरकार की Name Change Policy को केवल समर्थन या विरोध की नजर से देखना पर्याप्त नहीं।

यह नीति—


·         भारत की राजनीतिक भाषा,


·         प्रशासनिक प्रतीकों


·         और सांस्कृतिक आत्म-बोध

को नया आकार देने की कोशिश है।


अब असली परीक्षा यह है कि

क्या ‘सेवा’ और ‘कर्तव्य’ सिर्फ नामों में रहेंगे,

या शासन के व्यवहार में भी दिखेंगे? Name Change Policy of Modi Government